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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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244 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् "हे मनुष्यों! तुम लोग अपने पुत्र, पौत्र आदि को बलवान्, विद्वान्, बनाने के लिए शिक्षायज्ञ की वृद्धि करने वाले महान् विद्वान् आचार्य की सेवा में उपस्थित हो।" शिक्षा से ही चरित्र एवं व्यक्तित्व का निर्माण होता है। नागरिकों की शिक्षा और चरित्र से राष्ट्र की आधारशिला दृढ़ होती है। इससे व्यक्ति का योगदान देश व समाज के लिए उत्तम होता है। वैदिककालीन शिक्षा की भूमिका आज के सन्दर्भ में भी महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। अर्थदर्शन- वैदिक युग में अर्थदर्शन आज के सन्दर्भ में भी उल्लेखनीय है। किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को सुचारु गति देने के लिए राष्ट्र की कृषि और खनिज सम्पदा का विशेष महत्त्व होता है। आर्थिक दृष्टि से पृथिवी के प्रति पूर्ण जागरुकता विद्यमान थी। अभ्यर्ष स्वायुध सोम द्विबर्हसः रयिम्। अथा नो वस्यसस्कृधि॥१ अर्थात् "हे मनुष्यों के रक्षक परमेश्वर ! तू हमें द्युलोक तथा पृथिवी पर फैले धन को प्राप्त करा और हमें उन्नत कर।" पृथिवी से प्राप्त खनिज पदार्थों से भी राष्ट्र की समृद्धि में वृद्धि होती है और पृथिवी अपने गर्भ में सुवर्ण, रजत और न जाने कितने खनिजों को छिपाये बैठी है, जो हमारे राष्ट्र की समृद्धि का प्रतीक है। इन सबके प्रति मोह वैदिक काल में कहीं भी परिलक्षित नहीं होता था- सुता इन्द्राय वायवे वरुणाय मरुद्भ्यः। सोमा अर्षन्तु विष्णवे॥२ अर्थात् "हमारे शास्त्रीय विचार, विद्युत, वायु, जल, सुवर्ण आदि खनिज पदार्थ तथा यज्ञादि व्यापक परमेश्वर के ज्ञान के लिए हों।" आर्थिक दृष्टि से समृद्धि ही राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता में सहायक होती है क्योंकि आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न राष्ट्र आत्मनिर्भर होता है और विदेशी सहायता के लिए उसे पराश्रित नहीं होना पड़ता है। स्वयं की शान्ति का आधार देश का हर क्षेत्र में उन्नतिशील होना ही है। आज के सन्दर्भ में भी यही विषय विचारणीय है कि देश में उपलब्ध स्वदेशी वस्तुओं को प्रयोग करके आत्मनिर्भर बनें तथा अपने स्थान को विश्वमानचित्र में सम्मानीय बनाये रखें। १. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः ७/१०५३ २. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः ७/७६६ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar