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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 271

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चम अध्याय 243 अर्थात् “हे अध्यापक और उपदेशक! दिव्यगुण चाहने वाले सभी लोग, ज्ञान को आश्रय देने वाले तुम दोनों को पुकारते हैं। मैं भी तुम दोनों का आह्वान करता हूँ। तुम लोग ज्ञान का उपदेश देने के लिए प्रजा के पास जाते हो।” अत्यायातमश्विना तिरो विश्वा अहः सना। दस्रा हिरण्यवर्तनी सुषुम्णा सिन्धुवाहसा माध्वी मम श्रुतः हवम्॥२॥¹ अर्थात् “हे अध्यापक और उपदेशक! मैंने समस्त विद्याओं को आपसे पढ़ा है। सदा हमारे दुःख को दूर करने वाले, हिरण्य आदि का प्रयोग बताने वाले, परमेश्वर तक पहुँचाने वाले, मधुविद्या के ज्ञाता, आप लोग मेरी पुकार सुनें और मुझे संसार- सागर से पार लगावें।” शिक्षा से वंचित स्त्री व पुरुष के बारे में वैदिक काल में सोचना व्यर्थ ही है। गुरु को ईश्वर से साक्षात्कार कराने वाला स्वीकार किया गया है— गुरु बिन होय न ज्ञान। गुरु ही अज्ञानरूपी अंधकार को हटाकर उसमें ज्ञानरूपी प्रकाश का सूर्य चमकाता है और व्यक्ति उसी प्रकाश में जीवन को अच्छे विचारों से देखता एवं भोगता है। उस समय की शिक्षा मात्र ज्ञान के लिए ही नहीं अपितु सभी क्षेत्रों में इसका विकास था। शिल्प विद्या को भी प्रमुख स्थान दिया जाता था। आज का विज्ञान जो कुछ उपलब्ध करा रहा है उसकी रूपरेखा एवं उपस्थिति उस काल में भी थी। अश्विना वर्तिरस्मदा गोमद्दस्रा हिरण्यवत्। अर्वाग्रथः समनसा नि यच्छतम्॥² अर्थात् “हे शिल्प विद्या के पढ़ने और पढ़ाने वाले! शिल्पज्ञान के विघ्नों को दूर करने तथा समान मन वाले तुम लोग हमारे लिए गौ और सुवर्ण आदि की प्राप्ति का मार्ग दिखलाओं तथा हमें विमान आदि साधन भी प्रदान करों।” इसके साथ ही मनुष्यों को भी निर्देश दिया गया है कि वे अपने पुत्र-पौत्रों की शिक्षा के लिए विद्वान् आचार्य को ही नियुक्त करें। अग्निं वो वृधन्तमध्वराणां पुरूतमम्। अच्छा नप्त्रे सहस्वते॥³


१. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः १९/१७४४ २. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः १९/१७३४ ३. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः ५/९४६ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar