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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 353 में से

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पृष्ठ 270

242 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की पूर्ति करने वाले ईश्वर की सम्मिलित स्तुति करो, जगत् में वेद मंत्रों का पाठ करो। सत्य ही ईश्वर है और ईश्वर ही सत्य है, इसीलिए सत्याचार ही जीवन का आदर्श होना चाहिए। दूसरों के प्रति दया का भाव, सहानुभूति और सहयोग की भावना, मानव व्यवहार के वह उजले पक्ष हैं जो एक मनुष्य को उच्चता की ओर ले जाते हैं। परि त्यः हर्यतः हरिं बभ्रुं पुनन्ति वारेण। यो देवान् विश्वाँऽ इत् परि मदेन सह गच्छति॥१ अर्थात् "जो प्रसन्नता के साथ विद्वान् और अतिथियों की सेवा करता है उस कमनीय तथा भरण के योग्य मनुष्य को संसार के सभी उत्तम पदार्थ अपने उत्तम गुण के सहित प्राप्त होते हैं।" राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के लिए उच्च चरित्र के नागरिकों की आवश्यकता होती है और सद्आचरण के लोगों के आचार-विचार में नैतिकता और मानवता का समावेश होना चाहिए। शिक्षा दर्शन - वैदिक शिक्षा पद्धति का प्रमुख उद्देश्य मानव की प्राकृतिक शक्तियों को सुविकसित कर उसे जीवन के सागर में आने वाले झंझावतों से लड़ने की शक्ति प्रदान करने में समर्थ बनाना था। शिक्षा का संबंध ब्रह्मचर्य आश्रम से भी है। उस समय विद्यार्थियों को ब्रह्मचारी एवं ब्रह्मचारिणी कहा जाता था। अपना सम्पूर्ण ध्यान केन्द्रित करके शिक्षा व विद्या ग्रहण करना ही इनका उद्देश्य था। वैसे ब्रह्मचर्य का प्रथम ब्रह्म शब्द वेद, तप और सत्य का वाचक है। तपस्या के अनुष्ठानपूर्वक वेद और सत्य का ज्ञान प्राप्त करना ही विद्यार्थी का धर्म था, जिससे वह मृत्यु तक पर विजय प्राप्त कर सके। शिक्षक और उपदेशक भी अपने अक्षुण्ण ज्ञान को निःस्वार्थ भाव से विद्यार्थियों को देने को अपना परम कर्तव्य समझते थे। सम्पूर्ण ज्ञान से जन-जन को शिक्षित करके समाज को सुशिक्षित बनाना उनके लिए प्रसन्नता का विषय होता था और वे भी अपने शिष्यों की दृष्टि में परम पूज्य गुरु होते थे। इमा उ वां दिविष्टय उस्रा हवन्ते अश्विना। अयं वामह्वेऽवसे शचीवसू विशं विशंऽ हि गच्छथः॥२


१. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः १८/१६८१ २. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ३/३०४

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