वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 267, कुल 353 में से
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पञ्चम अध्याय 239
अवश्य हुआ लेकिन मानवमस्तिष्क में आज भी इसका प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित है। सामवेद में इसके बारे में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है— प्र भूर्जयन्तं महां विपोधां मूरैरमूरं पुरां दर्माणम्। नयन्तं गीर्भिर्वना धियं धा हरिश्मश्रुं न वर्मणा धनर्चिम्॥१ अर्थात् 'हे मनुष्य ! तू भूमि के चलाने वाले, महान् बुद्धिमानों के रक्षक, मूर्खों के द्वारा न जानने योग्य, मूल रहित वेदवाणी द्वारा, ज्ञान और रक्षा द्वारा, प्रशंसनीय सुख को प्राप्त कराने वाले सूर्य के समान धनों के स्वामी परमेश्वर को धारण कर।' मा नो हृणीथा अतिथिं वसुरग्निः पुरुप्रशस्त एषः। यः सुहोता स्वध्वरः॥२ अर्थात् हे मनुष्य ! जो परमेश्वर उत्तमदाता कल्याणकारी यज्ञ का स्वामी, सब का बसाने वाला तथा अत्यन्त प्रशंसनीय है, उस हमारे पूजनीय देव के प्रति क्रोध या अनादर का भाव मत करो। ईश्वर सदैव पूजनीय है, उसका स्वरूप अवर्णनीय है। वह सदैव ही मानव मात्र का सहायक होता है। उसकी स्तुति से सदैव कल्याण ही होता है। उसकी आराधना करते हुए संसार में सद्कर्मों और परोपकार में ही जीवन व्यतीत करना उचित होता है। पाप कर्मों का त्याग, जीव मात्र के प्रति दया, यज्ञ और स्तुतियों के द्वारा परमेश्वर की आराधना ही जीवन के प्रमुख उद्देश्यों में समाहित होना चाहिए। जीवन की पूर्णता इसी में व्याप्त है। वृत्रस्य त्वा श्वसथादोषमाणा विश्वेदेवा अजहुर्ये सखायः। मरुद्भिरिन्द्र सख्यं ते अस्त्वथेमा विश्वाः पृतना जयासि॥३ अर्थात् हे जीवात्मा ! जो इन्द्रियाँ तेरी मित्र होती हैं, वे भी पाप के श्वास से ही प्रभावित होकर तेरा साथ छोड़ देती है। केवल प्राण ही तेरे साथी होते हैं। जब ये साथ देते हैं तो पाप की सारी सेना को तू जीत लेता है। त्वं ह त्यत्सप्तभ्यो जायमानोऽशत्रुभ्यो अभवः शत्रुरिन्द्र। गूढे द्यावापृथिवी अन्वविन्दो विभुमद्द्भ्यो भुवनेभ्यो रणं धाः॥४
१. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः १/७४ २. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः १/३४ ३. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः १/३२४ ४. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ३/३२६
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar