वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 268, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 240 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् हे जीव! तू मित्ररूप सात इन्द्रियों के लिए उत्पन्न होकर भोगों में फँसा हुआ उनका शत्रु बन जाता है। तू अत्यन्त गूढ़, द्यु एवम् पृथिवी लोक में भी कर्मानुसार प्राप्त होता है। तू ऐश्वर्यशाली लोकों की प्राप्ति के लिए जीवन संग्राम को धारण करता है। जीवन में ज्ञान और कर्म का उपदेश ही महत्त्वपूर्ण है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार कर्मों का फल मनुष्य को सदैव ही प्राप्त होता है। सद्कर्मों का फल जीवन में सद् ही प्राप्त होता है और दुष्कर्मों का फल सदैव बुरा ही हो सकता है। इस अवधारणा से व्यक्ति का जीवन भी नियंत्रित होता है क्योंकि उसे कर्मफल का भय सदैव ही भयभीत करता रहता है। अचेत्यग्निश्चिकितिर्हव्यवाट् न सुमद्रथः॥१ अर्थात् "परमात्मा को सब जानते हैं और वह भी सबको जानता है। परमात्मा मनुष्यों को उनके भले और बुरे कर्मों के फल तथा योग्य पदार्थों को देता है। शुद्ध ज्ञान ही भगवान् का रथ है।" धर्म के अनुसार मनुष्य की अन्तिम गति मोक्ष प्राप्त करने की होती है और वह इस शाश्वत सत्य को कभी नहीं भूलता कि मृत्यु अवश्यम्भावी है और उसे मोक्ष प्राप्ति हेतु जप-तप करने में रत रहना है। यह उसके जीवन का महत्त्वपूर्ण चरण होता है। तरत्स मन्दी धावति धारा सुतस्यान्धसः। तरत्स मन्दी धावति॥२ अर्थात् जो पुरुष अन्नरूप सुन्दर गिरायी हुई सोमरस की धारा से यज्ञ करता हुआ परमेश्वर की स्तुति करता है, वह स्तुति करने वाला अवश्य ही तर जाता है। अर्थात् उत्तम गति पाता है। एते असृग्रमिन्दवस्तिरः पवित्रमाशवः। विश्वान्यभि सौभगा॥३ अर्थात् सब शुभगुणों से युक्त यज्ञ, दुःखों से पार लगाने वाले पवित्र निष्काम कर्म और समस्त संपदाओं की प्राप्ति के उद्देश्य से किये जाते हैं। इस प्रकार सामवेद में वर्णित धर्मदर्शन अन्य वेदों से पृथक् नहीं है। वेदों के अनुसार मानव जीवन धर्माचरण से युक्त नैतिकता की प्रमुखता वाला था। इसमें ईश्वर, राष्ट्र, परिवार सभी की महत्ता को स्वीकार किया गया है। राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में इस दर्शन के अनुसार इस भावना को दृढ़ता प्राप्त १. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४४ २. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ५/५०० ३. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः ४/८३० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar