वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 238 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता ही तू अपने शत्रुओं के सम्मुख जा, आक्रमण कर तथा उनका नाश करके अपने राष्ट्र की रक्षा कर। राष्ट्र की रक्षा उसकी अखण्डता से जुड़ी हुई है और इसी के लिए सम्पूर्ण राष्ट्र एक होकर शत्रुओं का सामना करने के लिए तैयार रहता है। वेदों में राष्ट्र-भक्तों को मातृभूमि के पुत्र और पृथिवी को उनकी माता बतलाया गया है। इसी भावना का विकास करते हुए ही कहा गया है कि राष्ट्र के निवासियों में किसी भी प्रकार की ज्येष्ठता और कनिष्ठता की भावना नहीं होना चाहिए और सामान्य रूप से प्रयत्नशील होते हुए राष्ट्र की उन्नति में तत्पर रहना चाहिये। ऐसे ही विचारशील मनुष्यों से राष्ट्र उत्तम फल की आशा कर सकता है जो राष्ट्र की सामूहिक हित की कामना को पूर्ण करने में सक्षम हो सकते हों। परमेश्वर से यही प्रार्थना की गयी है कि इस प्रकार की भावना जनमानस में अधिकाधिक रूप से विद्यमान हो। इसी प्रकार किसी नवोदित देश या राष्ट्र का सहज कल्याण हो सकता है। इस प्रकार की उदात्त भावना का शुद्ध रूप हमें अपने देश भारतवर्ष के संविधान की प्रस्तावना या घोषणा पत्र में भी दृष्टिगोचर होता है जो कि उसके सबसे प्रथम मुखपृष्ठ पर ही इस प्रकार अंकित है— "भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुसत्ता सम्पन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख २६ नवम्बर १९४९ ई० (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल ६ सम्वत् २००६ वि०) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।" इसमें समाहित सभी गुण हमें वैदिक काल के राजदर्शन से ही प्राप्त हो रहे हैं। ४. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में सामवेद के धर्मदर्शन का अनुशीलन- भारत में मानव जीवन की संचालनशक्ति धर्म को ही माना गया है और यही कारण है कि व्यक्ति आज भी धार्मिकता से अपने आपको पृथक् नहीं कर पाता है। वह पाप और पुण्य की अवधारणा में बँधा हुआ है। वैदिक साहित्य में तो जीवन के उद्देश्यों में प्रमुख 'धर्म' को ही माना गया था, कालान्तर में इसके स्वरूप में परिवर्तन CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar