भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पञ्चम अध्याय $\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad$ 237 कदा वसो स्तोत्रꣳहर्यत आ अव श्मशा रुधद्वाः। दीर्घꣳ सुतं वाताप्याय॥$^{१}$ अर्थात् हे ऐश्वर्यवान् राजन्! जब कभी जल-वृष्टि रुक जावे, तब वेदप्रेमी महान् प्रजावर्ग को जल प्रदान करने के लिए नहर बनवाओ। योनिष्ट इन्द्र सदने अकारि तमा नृभिः पुरुहूत प्र याहि। असो यथा नोऽविता वृधश्चिद्ददो वसूनि ममदश्च सोमैः॥$^{२}$ अर्थात् 'हे राष्ट्रपति! सभा के स्थान में तेरा मंच बना दिया गया है। हे बहुमत प्राप्त करने वाले! तू सहायक मनुष्यों के साथ उस मंच पर विराजमान हो, जिस प्रकार हमारी रक्षा और उन्नति कर सके, कर। हमें हमारी सम्पत्तियाँ दे और स्वयं भी योग्य पदार्थों से तृप्त हो।' स्वादोरित्या विषूवतो मधोः पिबन्ति गौर्यः। या इन्द्रेण सयावरीर्वृष्णा मदन्ति शोभथा वस्वीरनु स्वराज्यम्॥ $^{३}$ "हे ईश्वर! (सारी प्रजायें) धन-धान्य से पूर्ण पृथिवी पर प्रजातंत्र शासन होने पर उसी प्रकार तृप्त और प्रसन्न होती हैं, जिस प्रकार वर्षा करने वाले सूर्य के साथ चलने वाली किरणें स्वादिष्ट और मधुर जल ग्रहण करती और लोगों को सुखी करती हैं।" प्रजातंत्र शासन की अवधारणा उस समय भी विद्यमान थी और इसी को सर्वश्रेष्ठ भी माना जाता था। अनावश्यक अतिक्रमण या अधिकारों का हनन किसी भी समय अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था। आज का प्रजातंत्र और राष्ट्र की एकता और अखण्डता का सन्देश वैदिक युग से ही प्राप्त किया गया प्रतीत होता है। राष्ट्र का स्थान व्यक्ति के जीवन में सर्वोपरि रहा है। राष्ट्र की शत्रुओं से रक्षा करना सबका एक मात्र ध्येय रहता था। प्रेहाभीहि धृष्णुहि न ते वज्रो नि यꣳ सते। इन्द्र नृम्णाꣳ हि ते शवो हनो वृत्रं जया अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम्॥$^{४}$ अर्थात् हे राष्ट्रपति! कोई शत्रु तेरे शस्त्र को नहीं रोक सकता। तेरा बल शत्रुओं को झुका देने वाला है। जैसे सूर्य मेघ को छिन्न-भिन्न कर जल की वर्षा करता है, ऐसे १. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः २/२२८ २. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः २/३१४ ३. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४०९ ४. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४१३

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar