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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 353 में से

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पृष्ठ 264

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 236 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता य ऊर्ध्वाया स्वध्वरो देवो देवाच्या कृपा। घृतस्य विभ्राष्टिमनु शुक्रशोचिष आजुह्वानस्य सर्पिषः॥१ अर्थात् ' हे कन्ये ! जो पुरुष उत्तम विद्या से कल्याणकारी यज्ञ करने वाला हो, विद्वानों को प्राप्त होने वाली ईश्वर की कृपा से मनोहर हो, जो होम के लिए प्राप्त करने में योग्य शुद्ध पवित्र घी के साथ अनेक प्रकार के पदार्थ को पकाने वाली अग्नि के समान तेजस्वी हो, जो प्रसिद्ध विद्वान् पुरुष के समान विद्या को भी प्रकट करने की शक्ति रखता हो, मैं ऐसे पुरुष को ही पति स्वीकार करती हूँ, तू भी ऐसा ही कर।' इस तरह विवाह संस्कार में जाति या वर्ण का कोई भी अवरोध नहीं था। इस तरह की स्वतंत्रता लोगों के मध्य वैमनस्य या संकीर्णता की भावना उत्पन्न नहीं होने देती है और सम्पूर्ण विश्व हमारा परिवार है, ऐसी भावना जागृत होती है और ये सभी स्थितियाँ देश की एकता और अखण्डता के लिए काल में पाये जाने वाले सकारात्मक घटक कहें जायेंगे। ३. राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में सामवेद के राजदर्शन का अनुशीलन- सामवेद काल में राजनैतिक व्यवस्था भी आदर्श थी, जिसमें सम्पूर्ण राष्ट्र में एकता एवं अखण्डता की भावना की अनुभूति होती थी। वैदिक काल में स्वराज्य शासन प्रणाली का प्राविधान दृष्टिगोचर होता है। स्वराज्य का वास्तविक अर्थ है- "आत्म नियंत्रण या स्वयं के ऊपर शासन। जहाँ मानव स्वशासित होता है वहाँ पर किसी अन्य नियंत्रण की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती है। राजा के बारे में एक आदर्श व्यक्ति का स्वरूप चित्रित मिलता है जो कि परम हितैषी, न्यायकारी, विद्वान् पुरुष ही हो सकता है और ऐसे राज्य में सुख शान्ति की ही कल्पना की जा सकती है- यः रक्षन्ति प्रचेतसो वरुणो मित्रो अर्यमा। न किः स दभ्यते जनः॥२ अर्थात् हे मनुष्यों ! हितैषी, न्यायकारी राजा और उत्तम ज्ञानी पुरुष जिस मनुष्य की रक्षा करते हैं, कोई उन्हें हानि नहीं पहुँचा सकता है। जिस राष्ट्र का राजा ही योग्य व न्यायी होगा उसकी समृद्धि और सुख शान्ति पर सन्देह नहीं किया जा सकता है। स्थान-स्थान पर राजा के लिए कर्त्तव्यों के निर्देश दिये गये हैं- १. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४६५ २. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः २/१८५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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