भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 353 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 259

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चम अध्याय 231 प्रेह्मभीहि धृष्णुहि न ते वज्रो नि यंः सते। इन्द्र नृम्णः हि ते शवो हनो वृत्रं जया अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम्॥१ अर्थात् "हे राष्ट्रपति ! कोई शत्रु तेरा शस्त्र नहीं रोक सकता। तेरा बल शत्रुओं को झुका देने वाला है। जैसे सूर्य मेघ को छिन्न-भिन्न कर जल की वर्षा करता है, ऐसे ही तू अपने शत्रुओं के सम्मुख जा, आक्रमण कर तथा उनका नाश करके अपने राष्ट्र की रक्षा कर।" यहाँ पर राष्ट्रपति का आशय किसी व्यक्ति विशेष के लिए न होकर राष्ट्र की एकता की शक्ति की ओर इंगित करके बताया जा रहा है कि राष्ट्र की संगठन शक्ति इतनी सबल होती है कि शक्तिशाली से शक्तिशाली शत्रु भी उसके आगे टिक नहीं सकता है। जब राष्ट्र की एकता की शक्ति शत्रु के सामने चट्टान की तरह अडिग खड़ी हो जाती है तो शत्रु अपनी पराजय स्वयं ही स्वीकार कर लेता है। यही वह सशक्त आधार है जिससे कि सदैव ही राष्ट्र की रक्षा होती रहती है। सामवेद के आधार पर कहा जा सकता है कि प्राचीन ऋषियों, मुनियों एवं विद्वानों ने इस बात की कल्पना कर ली थी कि ये आधार भविष्य के मानव जीवन को संचालित करने में सक्षम एवं पर्याप्त होंगे। अतः विचारणीय विषयों एवं समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हुए उन्होंने विचार प्रस्तुत किये थे जो आज देश की राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के तत्त्व हैं। वे उस काल में भी विचारणीय एवं आदर्श प्रस्तुत करने वाले समझे जाते थे, मात्र उनमें काल के अनुसार परिवर्तन हुआ है। २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में सामवेद के समाज- दर्शन का अनुशीलन : समाज के बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। जीवन का निवास ही समाज में होता है और उस समाज में रहकर जीवन व्यतीत करने के लिए उसके द्वारा बनाये गये नियमों का पालन मानव जीवन के लिए अनिवार्य होता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक की सारी क्रियायें समाज में ही घटित होती है। इस समाज की नैतिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि वैदिक काल में ही निश्चित कर दी गई थी और प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आज का समाज भी उसी का अनुकरण करता चला आ रहा है। इतनी स्पष्ट और सुनिश्चित परिकल्पना बनाई गई थी कि एक आदर्श समाज की रूपरेखा आज भी हमें परिलक्षित होती है। १. सामवेद ४/४१३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान) · पृष्ठ 259, कुल 353 में से · BharatKosha