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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 258

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230 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को कष्ट मत दो तथा किसी के साथ संग्राम मत करो। तुम लोग शत्रुओं पर विजय पाने के लिए प्रस्थान (कूच) करने वाले हो, किन्तु ऐसा न करो। यदि तुम लोगों का एक विचार (संगठन) हो तो बलवान् से बलवान् शत्रु पर भी विजय पाना और उसको अपने वश में रखना कठिन नहीं है।' इससे यह भाव प्रदर्शित होता है कि निरर्थक किसी भी व्यक्ति को कष्ट देना या आपसी वैमनस्य रखकर संघर्षरत होना नैतिक दृष्टि से उचित नहीं है। अपनी भावात्मक एकता का विकास करना चाहिए। जब देश में आपस में भावात्मक एकता बढ़ेगी तो इस एकता में व्यवधान डालने वाले इस एकता की भावना का सामना करने में अपने आपको समर्थ न पा सकेंगे और वे अवश्य ही पराजित हो जाएगें। स्वा॒दो॒रित्था॒ वि॑षू॒वतो॒ मध्वो॑: पिबन्ति गौ॒र्य॑:। या इन्द्रे॑ण स॒याव॑री॒र्वृष्णा॒ मद॑न्ति॒ शोभ॑था॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म्॥१ अर्थात् "हे ईश्वर! (सारी प्रजाएँ) धन-धान्य से पूर्ण पृथ्वी पर प्रजातंत्र शासन होने पर उसी प्रकार तृप्त और प्रसन्न होती हैं, जिस प्रकार वर्षा करने वाले सूर्य के साथ चलने वाली किरणें स्वादिष्ट और मधुर जल ग्रहण करती और लोगों को सुखी पहुँचाती हैं।" देश में प्रजातंत्र शासन की व्यवस्था और उसमें सन्निहित एकता की भावना ही राष्ट्रीय एकता का आधार है। जहाँ देश की प्रजा की शासन में भागीदारी होती है और वह अपने शासक को चुनने का अधिकार वहन करती है, उस शासन में व्यक्ति सुख एवं प्रसन्नता से रहता है और देश के प्रति समर्पित रहता है। देश के हर नागरिक का कर्तव्य है कि नैतिकता की दृष्टि से देश के अतिक्रमणकारी शत्रुओं का अन्त कर दे ताकि देश की एकता एवं अखण्डता पर प्रहार करने वाले तत्त्वों का अन्त हो सके। इ॒त्था हि सोम॑ इ॒न्मदो॒ ब्रह्म॑ च॒कार॒ वर्ध॑नम्। शवि॑ष्ठ व॒ज्रिन्नोज॑सा पृथि॒व्या निः शशा॒ अहि॑मर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥२ अर्थात् "हे बलवान् शस्त्रधारी योद्धा पुरुष ! अपने राज्य का स्वागत करता हुआ, काले साँप के समान आक्रमण करने वाले भूमि के शत्रुओं का सत्यानाश कर, क्योंकि आनन्द में मग्न होकर स्तुति करने वाले इसी प्रकार तेरी उन्नति का वर्णन करते हैं।" १. सामवेद ४/४०९ २. सामवेद ४/४१०

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar