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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 257

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चम अध्याय सामवेद में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन सामवेद में प्रतिबिम्बित राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का आधारतत्त्व : मातृभूमि और राष्ट्र का अस्तित्व मानव जाति के जन्म के साथ ही संज्ञान में आया था। प्राचीनकाल से लेकर आज तक भी अपने देश और मातृभूमि के प्रति प्रत्येक व्यक्ति का अगाध प्रेम एवं श्रद्धा जीवित रहती है। चाहे देश के अन्दर रहने वाला साधारण नागरिक हो या फिर देश की सीमाओं पर रक्षा कार्य में संलग्न राष्ट्र के प्रहरी सैनिक हो, सभी में एक ही प्रेम भावना विद्यमान रहती है। सामवेद में भी देश की एकता एवं अखण्डता के आधारतत्त्वों की उपस्थिति स्पष्ट परिलक्षित है। देश के नागरिकों में विद्यमान देश-प्रेम की भावना, मातृभूमि केप्रति अगाध श्रद्धा ही उन्हें प्राणोत्सर्ग के लिए उत्प्रेरित करती है। देश में विद्यमान इसी भावना को सामवेद के निम्न मंत्र में वर्णित किया गया है- आ बुन्दं वृत्रहा ददे जातः पृच्छाद्वि मातरम्। क उग्राः के ह शृण्विरे॥१ अर्थात् शस्त्रविद्या में चतुर योद्धा शस्त्र हाथ में लेकर माता (मातृभूमि की प्रजा) से पूछे कि कौन-कौन देशद्रोही सुने जाते हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सच्चा राष्ट्रप्रेमी देश में देशद्रोह की भावना रखने वालों को सहन नहीं कर सकता है क्योंकि वे राष्ट्र की एकता और अखण्डता के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं। सच्ची मातृभूमि ही वह भावना है जो कि राष्ट्र की एकता और अखण्डता की आधारशिला है। इसी भावना की उपस्थिति एक राष्ट्र को और अधिक दृढ़ता प्रदान कर सकती है। आ गन्ता मा रिषण्यत प्रस्थावानो माप स्थात समन्यवः। दृढांचिद्यमयिष्णवः॥२ अर्थात् 'हे यज्ञादि परोपकार के करने वालों! ऋत्विजों एवं वीरों! आओं, किसी १. सामवेद २/२१६ २. सामवेद ४/४१० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar