वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 250, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 222 वैदिक वाङ्गय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् "मनुष्यों को चाहिए कि नीच व्यवहार और नीच पुरुषों को छोड़ के अच्छे-अच्छे व्यवहार तथा उत्तम विद्वानों को नित्य चाहें और उत्तमों से उत्तम तथा न्यूनों से न्यून शिक्षा ग्रहण करें। यज्ञ के पदार्थों का तिरस्कार कभी न करें तथा सबको चाहिये कि एक-दूसरे के मेल से सुखी हों।" समाज एवं परिवार में मेलजोल का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस मेलजोल की भावना से आपसी वैमनस्य की उत्पत्ति नहीं होती है। सम्पूर्ण समाज एक परिवार के भाँति बना रहता है। "वसुधैव कुटुम्बकम्" की अवधारणा इसी का प्रतीक है और कुटुम्ब की तरह समझने वाले विद्वान्व्यक्ति सर्वहित की कामना करते हैं। इससे पारस्परिक सम्बन्धों में दृढ़ता उत्पन्न होती है। इ॒ष्कर्त्तार॑मध्व॒रस्य॒ प्रचे॑तसं क्षय॑न्त॒र्थं राध॑सो म॒हः। रा॒तिं वा॒मस्य॑ सु॒भगां॑ म॒हीमिषं॒ दधा॑सि सान॒सिं र॒यिम्॥१ अर्थात् जो मनुष्य जैसे अपने लिए सुख की इच्छा करे वैसे ही दूसरों के लिए करे, वही आससत्कार के योग्य होता है। वह व्यवहार जो दूसरों के द्वारा अपने साथ होने पर मनुष्य को उचित न लगे, उसे स्वयं वैसा व्यवहार कदापि नहीं करना चाहिये। सबको यथोचित सम्मान एवं श्रद्धा देने से व्यक्ति के आत्मिक सन्तोष में वृद्धि होती है। यजुर्वेद का आचारदर्शन एक दिशा प्रदान करता है क्योंकि इसमें मनुष्य को किसी से वैर रखने या हिंसा भाव रखने की अनुमति दी ही नहीं गई है। सबके प्रति समान भाव का दृष्टिकोण हो, ऐसा व्यवहार उसे मानवता की ओर ले जाता है। इस तरह का आचार-व्यवहार राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा जाय तो यही स्पष्ट होता है कि यहाँ देश को जोड़ने और जोड़े ही रखने का सन्देश प्राप्त होता है। शिक्षा दर्शन :- मानव के जीवन में शिक्षा का क्रम जन्म से लेकर मृत्यु तक निरन्तर चलता रहा है। कभी यह प्रत्यक्ष शिक्षा के रूप में और कभी अप्रत्यक्ष शिक्षा के रूप में चलता रहता है। बालक ग्रहण करने के लिए होता है और शिक्षक उसको प्रदान करने के लिए। शिक्षक का दायित्व भी बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है। आध॑त्त पि॒तरो॒ गर्भं॑ कुमा॒रं पुष्क॑रस्स्रजम्। यथे॒ह पुरु॑षोऽस॑त्॥२ १. यजुर्वेद १२/११० २. यजुर्वेद २/३३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar