वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ अध्याय २२१ वह ईश्वर की भक्ति एवं उपासना में लीन रहकर अपने दायित्वों की पूर्ति करता रहे। मनुष्यों को उचित है कि जिस वेद के जानने तथा पालन करने वाले परमेश्वर ने वेदविद्या, पृथिवी, जल, वायु और सूर्य आदि शुद्धि करने वाले पदार्थ प्रकाशित किये हैं, उसकी उपासना तथा पवित्र कर्मों के अनुष्ठान मनुष्यों को पूर्ण कामना और पवित्रता के साथ सम्पादित अवश्य करने चाहियें। परमपिता परमेश्वर, जिसने पञ्च-तत्त्वों से निर्मित मनुष्य के लिए सभी पदार्थ इस धरा पर उपलब्ध कराकर जीवन प्रदान किया है, उसके प्रति कृतज्ञ होते हुए और उसकी कृपा अपने ऊपर चाहने की कामना लेकर उसकी उपासना नित्य करनी चाहिये। उन्हें अपने जीवन में अपनाते हुए सत्य के मार्ग का सदैव ही अनुकरण करना चाहिये। विद्या ग्रहण कर उसके प्रचार हेतु प्रयत्नशील रहना भी एक मंगल कार्य है। परन्तु शिक्षादान के काल में स्वयं भी अध्ययन से विरत नहीं होना चाहिये क्योंकि ज्ञान अनन्त है और उसको ग्रहण करने के लिये एक जीवन बहुत छोटा है। भ॒वतं॑ नः॒ सम॑नसौ॒ सचे॑तसावरे॒पसौ॑। मा य॒ज्ञꣳ हिं॑सिष्टं॒ मा य॒ज्ञप॑तिं जातवेदसौ शि॒वौ भ॑वतम॒द्य नः॑॥१॥१ अर्थात् मनुष्य को उचित है कि विद्याप्रचार के लिए पढ़ना, पढ़ाना तथा मंगलाचरण को न छोड़े क्योंकि यही सर्वोत्तम कर्म है। वि॒भूर॑सि प्र॒वाह॑णो॒ वह्नि॑रसि हव्य॒वाह॑नः। श्वा॒त्रोऽसि॒ प्रचे॑तास्तु॒थोऽसि॑ वि॒श्ववे॑दाः॥२ अर्थात् सब मनुष्यों को उचित है कि ईश्वर और विद्वान् का सत्कार कर्म कभी न छोड़ें क्योंकि अन्य किसी से विद्या और सुख का लाभ नहीं हो सकता है। इसलिए इनको जानें। अत्यन्याँ२ अगां॒ नान्याँ२ उपा॑गामर्वा॒क् त्वा॒ परे॑भ्योऽविन्दं परो॒ऽवरै॑भ्यः। तं त्वा॑ जुषामहे देव वनस्पते देव॒यज्या॑यै दे॒वास्त्वा॑ देव॒यज्या॑यै जुषन्तां॒ विष्ण॑वे त्वा। ओष॑धे॒ त्राय॑स्व॒ स्वधि॑ते॒ मैनं॑ꣳ हिंसीः॒ ॥३ १. यजुर्वेद ५/३ २. यजुर्वेद ५/३१ ३. यजुर्वेद ५/४२