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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 353 में से

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पृष्ठ 248

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220 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता था और इससे विलग कोई क्रिया सम्पादित हो ही नहीं सकती थी। अर्थ की प्राप्ति भी धर्मानुसार आचरण के पश्चात् ही हो सकती थी। वेदों का हर मंत्र ही धर्म की व्याख्या करता है और जीवन-दर्शन को धर्ममय करके प्रस्तुत करता है। अक्र॒न् कर्म॑ कर्म॒कृत॑: सह वा॒चा म॑योभुवा॑। दे॒वेभ्यः॒ कर्म॑ कृ॒त्वास्तं॒ प्रेत॑ सचाभुवः॥१ अर्थात् मनुष्यों को चाहिए कि सर्वथा आलस्य को छोड़कर पुरुषार्थ में ही निरन्तर रह कर, अज्ञान को छोड़कर, वेद विद्या से शुद्ध की हुई वाणी के साथ सदा वर्तन करें और परस्पर प्रीति करके एक दूसरे का सहारा बनें। जो इस प्रकार के मनुष्य हैं, वे ही इस लोक के सुखों को प्राप्त होकर आनन्दित होते हैं। अन्य अर्थात् आलसी पुरुष आनन्द को कभी नहीं प्राप्त होते हैं। वैदिककालीन धर्म-दर्शन मानवहित, देशहित के लिए ही निर्मित था और यही कारण है कि आज भी जनसाधारण धर्म की भावना से विमुक्त नहीं हो होता है। जन्म से मृत्यु तक के सारे कार्य धर्मानुसार ही पूर्ण होते हैं। ५. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिपेक्ष्य में यजुर्वेद में आचार- दर्शन, शिक्षा-दर्शन एवं अर्थ-दर्शन का अनुशीलन : यजुर्वेद में वर्णित मंत्रों के द्वारा आध्यात्मिक, भौतिक, नैतिक, सामाजिक एवं राजनीतिक मूल्यों का प्रतिपादन किया गया है। इन्हीं के आधार पर जीवन मूल्यों का निर्धारण हुआ है। यजुर्वेद में यदि आचार-दर्शन पर दृष्टिपात करें तो ज्ञात होता है कि इन्हीं रास्तों पर चलकर मानव को जीवन के अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। मा न॒: शथं सो अ॒र॑रुषो धू॒र्त्तिः प्रण॑ङ् मर्त्यस्य। रक्षा॑ णो ब्रह्मणस्पते।।२ अर्थात् "मनुष्यों को सदा उत्तम काम करना चाहिए और बुरे-बुरे काम छोड़ देने चाहिए तथा किसी के साथ द्रोह व दुष्टों का संग भी न करना और धर्म की रक्षा व परमेश्वर की उपासना स्तुति और प्रार्थना निरन्तर करनी चाहिए।" जीवन में मनुष्यों को उत्तम कर्म करने का निर्देश दिया गया है। किन्तु जिससे अपना हित होता हो और किसी अन्य का अहित, उस कार्य को करना भी न्याय एवं धर्मसंगत नहीं माना जाता है। उसी तरह बुरे और दुष्ट मनोभाव वाले जीवों की संगति भी उचित नहीं मानी गई है। सदैव ही मनुष्य का यह प्रयास होना चाहिये कि १. यजुर्वेद ३/४७ २. यजुर्वेद ३/३०

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar