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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 353 में से

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पृष्ठ 247

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri चतुर्थ अध्याय 219 भी राज्य में विघटनकारी तत्त्वों की उपस्थिति की संभावना होने पर उनका दमन करने का प्राविधान रखा गया है। आदर्श राष्ट्र की भाँति स्त्री व पुरुष दोनों की ही शासन कार्य में सहभागिता स्वीकार की गई है। राज्य की अखण्डता के उद्देश्य से शत्रुओं के दमन के बारे में पूर्ण विवरण प्राप्त होता है। राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यजुर्वेद से पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है। ४. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यजुर्वेद के धर्मदर्शन का अनुशीलन : वैदिक काल में प्रयोग किये गये सभी कार्यों का सम्बन्ध एक दूसरे के साथ रहा है। उसी प्रकार धर्म को जीवन के हर पक्ष के साथ संयुक्त करके प्रस्तुत किया गया है। धर्म ही जीवन के प्रत्येक पक्ष का संचालन करता था। राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के दिए धर्म से जुड़ा हुआ आधार भी स्वीकार किया जा सकता है। धर्माचरण और सत्याचरण ही जीवन को संचालित करता रहा है। अग्ने॑ व्रतपते॒ व्र॒तम॑चारिषं॒ तच्छ॑कं॒ तन्मे॑ऽराधी॒ दम॒हं य ए॒वास्मि॒ सोऽस्मि॑॥१ अर्थात् "मनुष्य को यही निश्चय करना चाहिए कि मैं जैसा कर्म करता हूँ वैसा ही परमेश्वर की व्यवस्था से फल भोगता हूँ और भोगूँगा। सब प्राणी अपने कर्म से विरुद्ध फल को कभी प्राप्त नहीं करते। इसलिए सुख भोगने के लिए धर्मयुक्त कर्म ही करना चाहिये जिससे कभी दुःख न हो।" मानव जीवन का सीधा सम्बन्ध समाज एवं देश के साथ जुड़ा होता है। इसके लिए हर क्रियाकलाप ऐसा संतुलित होना चाहिये जिससे कि स्वयं से किसी अन्य व्यक्ति को भी कष्ट न हो। आ न॑ एतु॒ मनः॒ पुन॒: क्रत्वे॒ दक्षाय जीवसें॑। ज्योक् च॒ सूर्य॑ दृ॒शे॥२ अर्थात् "मनुष्य उत्तम कर्मों के अनुष्ठान के लिए चित्त की शुद्धि एवं जन्म-जन्म में उत्तम चित्त की प्राप्ति की ही इच्छा करें जिससे मनुष्यजन्म को प्राप्त होकर ईश्वर की उपासना का साधन करके उत्तम-उत्तम धर्मों का सेवन कर सकें।" विचार एवं कर्म की शुद्धता ही व्यक्ति के आचरण को शुद्ध रखती है। जीवन के व्यवहार एवं कर्तव्यों की पूर्ति के लिए भी उसे धर्मानुसार चलना होता है। वैदिक काल में धर्म पुरुषार्थ ऐसा है जो कि जीवन के सम्पूर्ण दर्शन को प्रभावित करता रहता १. यजुर्वेद २/२८ २. यजुर्वेद ३/५४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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