भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

चतुर्थ अध्याय २२१ वह ईश्वर की भक्ति एवं उपासना में लीन रहकर अपने दायित्वों की पूर्ति करता रहे। मनुष्यों को उचित है कि जिस वेद के जानने तथा पालन करने वाले परमेश्वर ने वेदविद्या, पृथिवी, जल, वायु और सूर्य आदि शुद्धि करने वाले पदार्थ प्रकाशित किये हैं, उसकी उपासना तथा पवित्र कर्मों के अनुष्ठान मनुष्यों को पूर्ण कामना और पवित्रता के साथ सम्पादित अवश्य करने चाहियें। परमपिता परमेश्वर, जिसने पञ्च-तत्त्वों से निर्मित मनुष्य के लिए सभी पदार्थ इस धरा पर उपलब्ध कराकर जीवन प्रदान किया है, उसके प्रति कृतज्ञ होते हुए और उसकी कृपा अपने ऊपर चाहने की कामना लेकर उसकी उपासना नित्य करनी चाहिये। उन्हें अपने जीवन में अपनाते हुए सत्य के मार्ग का सदैव ही अनुकरण करना चाहिये। विद्या ग्रहण कर उसके प्रचार हेतु प्रयत्नशील रहना भी एक मंगल कार्य है। परन्तु शिक्षादान के काल में स्वयं भी अध्ययन से विरत नहीं होना चाहिये क्योंकि ज्ञान अनन्त है और उसको ग्रहण करने के लिये एक जीवन बहुत छोटा है। भ॒वतं॑ नः॒ सम॑नसौ॒ सचे॑तसावरे॒पसौ॑। मा य॒ज्ञꣳ हिं॑सिष्टं॒ मा य॒ज्ञप॑तिं जातवेदसौ शि॒वौ भ॑वतम॒द्य नः॑॥१॥१ अर्थात् मनुष्य को उचित है कि विद्याप्रचार के लिए पढ़ना, पढ़ाना तथा मंगलाचरण को न छोड़े क्योंकि यही सर्वोत्तम कर्म है। वि॒भूर॑सि प्र॒वाह॑णो॒ वह्नि॑रसि हव्य॒वाह॑नः। श्वा॒त्रोऽसि॒ प्रचे॑तास्तु॒थोऽसि॑ वि॒श्ववे॑दाः॥२ अर्थात् सब मनुष्यों को उचित है कि ईश्वर और विद्वान् का सत्कार कर्म कभी न छोड़ें क्योंकि अन्य किसी से विद्या और सुख का लाभ नहीं हो सकता है। इसलिए इनको जानें। अत्यन्याँ२ अगां॒ नान्याँ२ उपा॑गामर्वा॒क् त्वा॒ परे॑भ्योऽविन्दं परो॒ऽवरै॑भ्यः। तं त्वा॑ जुषामहे देव वनस्पते देव॒यज्या॑यै दे॒वास्त्वा॑ देव॒यज्या॑यै जुषन्तां॒ विष्ण॑वे त्वा। ओष॑धे॒ त्राय॑स्व॒ स्वधि॑ते॒ मैनं॑ꣳ हिंसीः॒ ॥३ १. यजुर्वेद ५/३ २. यजुर्वेद ५/३१ ३. यजुर्वेद ५/४२

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 222 वैदिक वाङ्गय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् "मनुष्यों को चाहिए कि नीच व्यवहार और नीच पुरुषों को छोड़ के अच्छे-अच्छे व्यवहार तथा उत्तम विद्वानों को नित्य चाहें और उत्तमों से उत्तम तथा न्यूनों से न्यून शिक्षा ग्रहण करें। यज्ञ के पदार्थों का तिरस्कार कभी न करें तथा सबको चाहिये कि एक-दूसरे के मेल से सुखी हों।" समाज एवं परिवार में मेलजोल का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस मेलजोल की भावना से आपसी वैमनस्य की उत्पत्ति नहीं होती है। सम्पूर्ण समाज एक परिवार के भाँति बना रहता है। "वसुधैव कुटुम्बकम्" की अवधारणा इसी का प्रतीक है और कुटुम्ब की तरह समझने वाले विद्वान्व्यक्ति सर्वहित की कामना करते हैं। इससे पारस्परिक सम्बन्धों में दृढ़ता उत्पन्न होती है। इ॒ष्कर्त्तार॑मध्व॒रस्य॒ प्रचे॑तसं क्षय॑न्त॒र्थं राध॑सो म॒हः। रा॒तिं वा॒मस्य॑ सु॒भगां॑ म॒हीमिषं॒ दधा॑सि सान॒सिं र॒यिम्॥१ अर्थात् जो मनुष्य जैसे अपने लिए सुख की इच्छा करे वैसे ही दूसरों के लिए करे, वही आससत्कार के योग्य होता है। वह व्यवहार जो दूसरों के द्वारा अपने साथ होने पर मनुष्य को उचित न लगे, उसे स्वयं वैसा व्यवहार कदापि नहीं करना चाहिये। सबको यथोचित सम्मान एवं श्रद्धा देने से व्यक्ति के आत्मिक सन्तोष में वृद्धि होती है। यजुर्वेद का आचारदर्शन एक दिशा प्रदान करता है क्योंकि इसमें मनुष्य को किसी से वैर रखने या हिंसा भाव रखने की अनुमति दी ही नहीं गई है। सबके प्रति समान भाव का दृष्टिकोण हो, ऐसा व्यवहार उसे मानवता की ओर ले जाता है। इस तरह का आचार-व्यवहार राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा जाय तो यही स्पष्ट होता है कि यहाँ देश को जोड़ने और जोड़े ही रखने का सन्देश प्राप्त होता है। शिक्षा दर्शन :- मानव के जीवन में शिक्षा का क्रम जन्म से लेकर मृत्यु तक निरन्तर चलता रहा है। कभी यह प्रत्यक्ष शिक्षा के रूप में और कभी अप्रत्यक्ष शिक्षा के रूप में चलता रहता है। बालक ग्रहण करने के लिए होता है और शिक्षक उसको प्रदान करने के लिए। शिक्षक का दायित्व भी बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है। आध॑त्त पि॒तरो॒ गर्भं॑ कुमा॒रं पुष्क॑रस्स्रजम्। यथे॒ह पुरु॑षोऽस॑त्॥२ १. यजुर्वेद १२/११० २. यजुर्वेद २/३३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

चतुर्थ अध्याय 223 अर्थात् ईश्वर आज्ञा देता है कि विद्वान् पुरुष एवं स्त्रियों को चाहिए कि विद्यार्थी कुमार या कुमारी को विद्या देने के लिए गर्भ के समान धारण करें। जैसे क्रमशः गर्भ के बीच देह बढ़ता है वैसे अध्यापक लोगों को चाहिये कि अच्छी शिक्षा से ब्रह्मचारी, कुमार या कुमारी को श्रेष्ठ विद्या में वृद्धियुक्त करें तथा (उनका) पालन करें। वे विद्या के योग से धर्मात्मा और पुरुषार्थयुक्त होकर सदा सुखी हों, यह अनुष्ठान सदैव करना चाहिये। रेव॑ती रम॑ध्वं॒ बृह॑स्पते धा॒रया॒ वसू॑नि। ऋ॒तस्य॑ त्वा देवहविः पाशेन॒ प्रति॑ मुञ्चामि॒ धर्षा॒ मानु॑षः॥१ अर्थात् विद्वानों को अपनी शिक्षा से कुमार ब्रह्मचारी और कुमारी ब्रह्मचारिणियों को परमेश्वर से लेकर पृथ्वीपर्यन्त पदार्थों का बोध कराना चाहिए, जिससे वे अज्ञानरूपी बन्धन को छोड़कर सदा सुखी रहें। यजुर्वेद में शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता है क्योंकि जीवन में ज्ञान की कोई सीमा नहीं है, परमेश्वर से लेकर पृथ्वी तक के किसी भी वस्तु के गूढ़ज्ञान हेतु प्रयत्न करना और जिज्ञासा की प्रवृत्ति उनमें उत्पन्न होना ही ग्रहण करने की क्षमता का द्योतक है। शिक्षा ग्रहण काल में ब्रह्मचर्य का पालन अत्यन्त अनिवार्य है। इस आयु में ही उन्हें सत्याचरण, धर्माचरण, संयम एवं त्याग से परिचित करा दिया जाता है और यही आधारशिला उनके भविष्य के लिए होती है। वे अच्छे व्यक्ति, नागरिक, माता-पिता, पुत्र-पुत्री के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करते हैं। वाचं॑ ते शुन्धामि प्रा॒णं तें शुन्धामि॒ चक्षु॑स्ते शुन्धामि॒ श्रोत्रं॑ ते शुन्धामि॒ नाभिं॑ ते शुन्धामि॒ मेढ्रं॑ ते शुन्धामि पा॒युं तें शुन्धामि च॒रित्रौ॑स्ते शुन्धामि॥२ अर्थात् गुरु और गुरु पत्नियों को चाहिए कि वेद और उपवेद तथा वेद के अंग और उपांगों की शिक्षा में देह, इन्द्रिय, अन्तःकरण और मन की शुद्धि, शरीर की पुष्टि तथा प्राण की संतुष्टि देकर समस्त कुमार और कुमारियों को अच्छे-अच्छे गुणों में प्रवृत्त करावें। वेद-वेदांगों में शिक्षा का पूर्ण प्राविधान था। दर्शन, मनोविज्ञान, विज्ञान, योग, संगीत, कला आदि सभी की शिक्षा ग्रहण करने के बारे में उल्लेख प्राप्त होते हैं। १. यजुर्वेद ६/८ २. यजुर्वेद ६/१४

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 224 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता शिक्षा के प्रति अध्यापक और अध्येता दोनों के ही दायित्वों का पृथक्-पृथक् वर्णन किया गया है। पुरुष एवं स्त्री दोनों के लिए ही समस्त शिक्षा की व्यवस्था की गई थी। लिंग के भेद को कहीं भी महत्त्व प्रदान नहीं किया गया था और न ही स्त्री को अबला के रूप में वर्णित किया गया है। ब्रह्मा॑णि मे मतयः॒ शथं॑ सु॒तासः॒ शुष्म॑ इयर्ति प्रभुतो मे॒ अद्रि॑ः। आ शा॑स॒ते प्रति॑ हर्यन्त्यु॒क्थेमा हरी॑ वहत॒स्ता नो॒ अच्छ॑।।१ अर्थात् हे विद्वानों ! जिस कर्म से विद्या और मेघ की उन्नति हो, वैसी क्रिया करों। जो लोग तुम से विद्या और सुशिक्षा चाहते हैं उनको प्रेमपूर्वक दों, और जो आपसे अधिक विद्या वाले हों उनसे तुम विद्या ग्रहण करों। यजुर्वेद में शिक्षकों और उपदेशकों के लिए नियम निश्चित किये गए थे, जिनका अनुकरण ही उनको समाज व विद्यार्थियों के मध्य पूजनीय बनाता था। गुरु प्रथम पूज्य होता था। मनुष्य को ज्ञानी बनाने का कार्य गुरु के द्वारा ही सम्पन्न किया जाता था। दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्। आ द॑दे॒ नारि॑रसि।।२ अर्थात् हे मनुष्यों, तुम लोग उत्तम विद्वानों को प्राप्त होकर उनसे विद्या-शिक्षा ग्रहण कर इस सृष्टि में नायक बनो॑! विश्वा॒ आशा॑ दक्षिणस॒द्भिर्ऋ॒ दे॒वान्या॑ऽडिह। स्वाहा॑वृतस्य घ॒र्मस्य॒ मधो॑ः पिबतमश्विना।।३ अर्थात् उपदेशक शिक्षा दें और अध्यापक पढ़ावें, वैसे ही सब लोग ग्रहण करें। वैदिक काल की शिक्षा ने संतुलित एवं सुशिक्षित व्यक्ति के निर्माण का सदैव उपदेश दिया है। सभी तरह से शिक्षित एवं उन्नत विचारों वाले व्यक्ति देश की उन्नति व प्रगति के लिए सहयोग प्रदान करते हैं। जहाँ सभी लोगों को उच्चकोटि के विद्वानों द्वारा शिक्षा प्राप्त होती है, वे संकीर्णता और दुष्ट प्रवृत्तियों से अलग रहते हैं। राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यदि यजुर्वेद के शिक्षा दर्शन को देखा जाय तो १. यजुर्वेद ३३/७८ २. यजुर्वेद ३७/१ ३. यजुर्वेद ३८/१० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri चतुर्थ अध्याय 225 स्पष्ट होता है कि नागरिकों की पृष्ठभूमि ऐसी बनाई जाती है कि वे देशहित और मानवहित को कभी उपेक्षित ही नहीं कर सकते हैं। अर्थ-दर्शन :- वैदिक युग में आर्थिक अवस्था अत्यन्त सुविकसित होती है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को सुचारु गति देने के लिए उस देश की कृषि और खनिज सम्पदा का विशेष महत्त्व होता है। आर्थिक दृष्टि से पृथिवी के प्रति पूर्ण जागरुकता विद्यमान थी। तत्कालीन आर्यगण इस तथ्य से अवगत थे कि पृथिवी वसुधा ही नहीं विश्वम्भरा (सबका भरण-पोषण करने वाली) भी है। वह हिरण्यवक्षा (अपने गर्भ में स्वर्णादि की खानों को छिपाये हुए) है। उस पृथिवी से मातृवत् पालन करने की प्रार्थना की गई है— 'सा नो भूमिर्विंसृजतां माता पुत्राय मे पयः। इस पृथिवी पर उत्पन्न प्राणियों के भरण-पोषण का दायित्व मातृभूमि पर ही होता है।' सी॒रा यु॒ञ्जन्ति क॒वयॊ यु॒गा वि॑तन्वते॒ पृथ॑क्। धीरा॑ दे॒वेषु॑ सुम्न॒या।।१ अर्थात् मनुष्यों को चाहिए कि विद्वानों की शिक्षा से कृषि कर्म की उन्नति करें। जैसे योगी नाड़ियों में परमेश्वर को समाधियोग से प्राप्त होते हैं, वैसे ही कृषि कर्म द्वारा सुखों को प्राप्त होवें। लाङ्ग॑लं पवी॑रवत्स॒शेव॑नं सोम॒पित्स॑रु। तदुद्व॑पति॒ गामविं॑ प्र॒फर्व्यं॑ च॒ पीवरीं॑ प्र॒स्थाव॑द्रथ॒वाह॑नम्।।२ अर्थात् "किसान लोगों को उचित है कि मोटी मिट्टी, अन्न आदि की उत्पत्ति से रक्षा करने वाली पृथिवी की अच्छी तरह से परीक्षा करके, हल आदि साधनों से समतल कर, सुन्दर संस्कारित बीजों से उत्तम धान्य उत्पन्न करके भोगें।" यजुर्वेद में पशुपालन को वैयक्तिक आधार पर ही नहीं अपितु व्यावसायिक आधार पर भी उचित माना गया था इसीलिये इसका उल्लेख प्राप्त होता है। अर्मेभ्यो हस्ति॒पं ज॒वाया॑श्व॒पं पुष्ट्यै॑ गो॒पालं वीर्या॑याविपा॒लं तेज॑सेऽजपा॒लमिरा॑यै की॒नाश॑ं। की॒लाला॑य सुरा॒कारं॑ भ॒द्राय॑ गृ॒हप॑थं॒ श्रेय॑से वित्त॒धमाध्य॑क्ष्यायानुक्ष॒त्तार॑म्।।३ अर्थात् राजपुरुषों को चाहिए कि अच्छे शिक्षित हाथी आदि को रखने वाले पुरुषों को ग्रहण कर इनसे बहुत से व्यवहार सिद्ध करें। १. यजुर्वेद १२/६७ २. यजुर्वेद १२/७१ ३. यजुर्वेद ३०/११ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

226 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता इसी प्रकार इस काल में अनेक प्रकार के उद्योग-धन्धें एवं शिल्प प्रचलित थे। इनमें बाय (कपड़ा बुनने वाले), त्वष्टा या तक्षा (बढ़ई—चाक, नौका, लकड़ी के पात्र आदि बनाने वाले), कर्मकार (लुहार—कृषि यंत्र, युद्धों के निमित्त आयुध निर्माता), कुम्हार, माली, चमार, डोम, नाई, वैद्य, स्वर्णकार आदि मुख्य हैं। विशाल भवनों का निर्माता राजगीरों का भी उल्लेख है। यजुर्वेद के विभिन्न मंत्रों (३०/६,७,१७,२०) में रथकार, तक्षा, मौलाल, कर्मार, मणिकार, इषुकार, धनुष्कार, रज्जु सर्ग, हस्तिप, अश्वप, सुराकार, हिरण्यकार, वणिक प्रभृति शिल्पियों का उल्लेख है। वैदिक काल में द्विविध व्यापार प्रणाली का उल्लेख मिलता है- आन्तरिक एवं बाह्य। आन्तरिक व्यापार भारत में ही विभिन्न प्रदेशों एवं नगरों में विद्यमान था। विदेशों के साथ नौकाओं एवं जलयानों के माध्यम से बाह्य व्यापार भी उस युग में विकसित स्थिति में था। एक स्थान से दूसरे स्थान पर उत्पादित माल को लाने ले जाने के लिये व्यापारी वर्ग बैलों, घोड़ों, ऊँटों, कुत्तों तथा गधों का उपयोग करते थे। अनेक व्यापारी समुद्र मार्ग से भी व्यापार करते थे। निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है कि वैदिक काल में यजुर्वेद के अनुसार अत्यन्त समृद्ध एवं सम्पन्न अर्थव्यवस्था विद्यमान थी। आर्थिक आधार पर समाज में श्रेणियाँ नहीं थी। समतामूलक, श्रम की प्रतिष्ठाकारक और सांस्कृतिक-जीवन के लिए उपादेय, वह अर्थव्यवस्था हमें आज भी स्पृहणीय प्रतीत होती है, जिसमें धनोपार्जन की केवल शुद्ध, विधिसम्मत और समाज के द्वारा अनुमोदित प्रणाली प्रशस्त समझी जाती थी। स्वार्जित धन का उपयोग भी व्यक्ति को त्यागपूर्वक करना चाहिये। किसी अन्य के धन की कामना न करें। इस तरह का भाव मुखरित रहा है। यथा— “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः, या गृधः कस्यस्विद्धनम्।” यजुर्वेद का अर्थदर्शन भी समृद्धि की ओर इंगित करता है। अपने व्यवसाय के प्रति ईमानदारी और दूसरों की समृद्धि में सहयोग की कामना रखने वाले व्यक्ति थे। इस तरह के भाव से देश की उन्नति, एकता में सहयोगी तत्त्व बनकर उससे दृढ़ता सिद्ध होती है। ६. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को यजुर्वेद का प्रदेय : देश या राष्ट्र की सुख-समृद्धि एवं प्रसन्नता ही सभी युगों में प्राप्त साहित्य, काव्य, महाकाव्यों एवं आध्यात्मिक ग्रन्थों में वर्णित रही है। राष्ट्र की एकता और अखण्डता के सन्दर्भ में निम्न मंत्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है—

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

चतुर्थ अध्याय 227 आ त्वाहार्षमन्तरम् ध्रुवस्तिष्ठा विचाचलिः। विश सूत्वा सर्वा वाञ्छन्तु या त्वद्राष्ट्रमधिभ्रशत्॥ १ अर्थात् 'हे अग्ने! मैं तुमको लाया हूँ, तुम भीतर हो (नाभि के ऊपर शरीर के मध्य में)। तुम चलनरहित हो स्थिर बैठो। सारी प्रजा तुम्हें चाहे। राष्ट्र अर्थात् जन समूह तुमसे गिरे नहीं।' इससे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि राष्ट्र में जनसमूह के विश्वास का कितना बड़ा स्थान है। राष्ट्र में श्रद्धा, उसकी एकता एवं अखण्डता के प्रति उद्घोष ही उसके अस्तित्व को चिरस्थायी रखने के लिए पर्याप्त है। यजुर्वेद में राजाओं को दिये गये निर्देशों के अनुसार वे अपनी प्रजा का पालन पुत्रवत् करें। अपने देश की उन्नति एवं समृद्धि के लिए यथोचित प्रयास करें। समाज के विद्वानों की सहायता से ही राज्य का शासनकार्य संचालित करें ताकि उनकी प्रजा को योग्य प्रजापालकों का संरक्षण प्राप्त हो और उनके अपने बहुमखी विकास में किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न हो। यही भावना प्रजा को एक निश्चितता प्रदान करती है और अच्छे राजा तथा विद्वान् मंत्रिगण एवं योग्य सेनापतियों के संरक्षण में वे अपने जीवन को सुरक्षित अनुभव करते हैं। उनके उत्तर में ही वे अपने राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के लिए स्वयं प्रयत्नशील होते हैं। उनकी भावनाएँ राष्ट्र के प्रति सीमाओं से नहीं अपितु उसकी मिट्टी से जुड़ी होती है। दुश्मनों की बुरी दृष्टि भी उन्हें स्वीकार नहीं होती है। यजुर्वेद में निर्देशित (७/२०)² मंत्र के अनुसार राजा और विद्वानों के लिए निश्चित किया है कि वे राज्य की निरन्तर उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहें। वे उपदेश और विद्या के प्रचार द्वारा ही अपनी प्रजा को अभिभूत कर सकते हैं। राजा, प्रजा और उत्तम विद्वानों की परस्पर प्रीति से ही ऐश्वर्य की उन्नति और आनन्द में वृद्धि होना संभव है। राष्ट्र में फैली अशिक्षा और विचारों की संकीर्णता ही राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के मार्ग में बाधक बन सकती है। जबकि यजुर्वेद में उल्लिखित मंत्रों के अनुरूप विद्या के प्रचार से ही हम उनके अन्तर में व्याप्त संकीर्णता, साम्प्रदायिकता, अशिक्षा को दूर करके उनके विचारों में समृद्धि ला सकते हैं और वे राष्ट्र की एकता के लिए मजबूत श्रृंखला बनाने में सक्रिय होंगे। राजनीति में १. वाजसनेयी संहिता १२/११ २. पूर्व में उल्लिखित

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 228 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता उनकी सीधी भागीदारी भी उनको राष्ट्र से प्रत्यक्ष तौर पर जोड़ती है। उन्हें अपनी महत्ता का स्वयं ज्ञान होता है। यजुर्वेद में उल्लिखित (३४/९४) मंत्र में वर्णित है कि “जो मनुष्य एक दूसरे के लिए सुख देवें, जो मिलकर दुष्टों का वध करें, वे पुत्र-पौत्र वाले होकर भी मनुष्यों के सुख की उन्नति में समर्थ-विद्वान् होने योग्य होते हैं।” इसमें दुष्टों से आशय देश की एकता एवं अखण्डता पर आघात करने वालों को माना जा सकता है क्योंकि दुष्ट-प्रवृत्ति के लोग ही देश के आन्तरिक वातावरण को बिगाड़ने के लिए आतंक फैलाने वाली क्रियाएँ करते हैं। अतः ऐसे लोगों के दमन का पूर्ण उल्लेख है। देश में ऐसे लोगों को मान्यता प्रदान की गई है जो एक दूसरे के लिए सुखकारी प्रमाणित हो सकें। प्राचीन काल से ही भारत एक विस्तृत एवं महान् राष्ट्र के रूप में माना जाता रहा है और इसकी सभ्यता एवं संस्कृति इस बात का प्रतीक है कि विदेशों से आये लोगों को भी मित्रवत् स्वीकार किया जाता रहा है। किसी अन्य राष्ट्र की स्वतंत्रता या अखण्डता का हनन करने का प्रयास कभी नहीं किया गया और न ही अपनी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता पर प्रहार करने वालों को क्षमा किया गया। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चम अध्याय सामवेद में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन सामवेद में प्रतिबिम्बित राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का आधारतत्त्व : मातृभूमि और राष्ट्र का अस्तित्व मानव जाति के जन्म के साथ ही संज्ञान में आया था। प्राचीनकाल से लेकर आज तक भी अपने देश और मातृभूमि के प्रति प्रत्येक व्यक्ति का अगाध प्रेम एवं श्रद्धा जीवित रहती है। चाहे देश के अन्दर रहने वाला साधारण नागरिक हो या फिर देश की सीमाओं पर रक्षा कार्य में संलग्न राष्ट्र के प्रहरी सैनिक हो, सभी में एक ही प्रेम भावना विद्यमान रहती है। सामवेद में भी देश की एकता एवं अखण्डता के आधारतत्त्वों की उपस्थिति स्पष्ट परिलक्षित है। देश के नागरिकों में विद्यमान देश-प्रेम की भावना, मातृभूमि केप्रति अगाध श्रद्धा ही उन्हें प्राणोत्सर्ग के लिए उत्प्रेरित करती है। देश में विद्यमान इसी भावना को सामवेद के निम्न मंत्र में वर्णित किया गया है- आ बुन्दं वृत्रहा ददे जातः पृच्छाद्वि मातरम्। क उग्राः के ह शृण्विरे॥१ अर्थात् शस्त्रविद्या में चतुर योद्धा शस्त्र हाथ में लेकर माता (मातृभूमि की प्रजा) से पूछे कि कौन-कौन देशद्रोही सुने जाते हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सच्चा राष्ट्रप्रेमी देश में देशद्रोह की भावना रखने वालों को सहन नहीं कर सकता है क्योंकि वे राष्ट्र की एकता और अखण्डता के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं। सच्ची मातृभूमि ही वह भावना है जो कि राष्ट्र की एकता और अखण्डता की आधारशिला है। इसी भावना की उपस्थिति एक राष्ट्र को और अधिक दृढ़ता प्रदान कर सकती है। आ गन्ता मा रिषण्यत प्रस्थावानो माप स्थात समन्यवः। दृढांचिद्यमयिष्णवः॥२ अर्थात् 'हे यज्ञादि परोपकार के करने वालों! ऋत्विजों एवं वीरों! आओं, किसी १. सामवेद २/२१६ २. सामवेद ४/४१० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

230 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को कष्ट मत दो तथा किसी के साथ संग्राम मत करो। तुम लोग शत्रुओं पर विजय पाने के लिए प्रस्थान (कूच) करने वाले हो, किन्तु ऐसा न करो। यदि तुम लोगों का एक विचार (संगठन) हो तो बलवान् से बलवान् शत्रु पर भी विजय पाना और उसको अपने वश में रखना कठिन नहीं है।' इससे यह भाव प्रदर्शित होता है कि निरर्थक किसी भी व्यक्ति को कष्ट देना या आपसी वैमनस्य रखकर संघर्षरत होना नैतिक दृष्टि से उचित नहीं है। अपनी भावात्मक एकता का विकास करना चाहिए। जब देश में आपस में भावात्मक एकता बढ़ेगी तो इस एकता में व्यवधान डालने वाले इस एकता की भावना का सामना करने में अपने आपको समर्थ न पा सकेंगे और वे अवश्य ही पराजित हो जाएगें। स्वा॒दो॒रित्था॒ वि॑षू॒वतो॒ मध्वो॑: पिबन्ति गौ॒र्य॑:। या इन्द्रे॑ण स॒याव॑री॒र्वृष्णा॒ मद॑न्ति॒ शोभ॑था॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म्॥१ अर्थात् "हे ईश्वर! (सारी प्रजाएँ) धन-धान्य से पूर्ण पृथ्वी पर प्रजातंत्र शासन होने पर उसी प्रकार तृप्त और प्रसन्न होती हैं, जिस प्रकार वर्षा करने वाले सूर्य के साथ चलने वाली किरणें स्वादिष्ट और मधुर जल ग्रहण करती और लोगों को सुखी पहुँचाती हैं।" देश में प्रजातंत्र शासन की व्यवस्था और उसमें सन्निहित एकता की भावना ही राष्ट्रीय एकता का आधार है। जहाँ देश की प्रजा की शासन में भागीदारी होती है और वह अपने शासक को चुनने का अधिकार वहन करती है, उस शासन में व्यक्ति सुख एवं प्रसन्नता से रहता है और देश के प्रति समर्पित रहता है। देश के हर नागरिक का कर्तव्य है कि नैतिकता की दृष्टि से देश के अतिक्रमणकारी शत्रुओं का अन्त कर दे ताकि देश की एकता एवं अखण्डता पर प्रहार करने वाले तत्त्वों का अन्त हो सके। इ॒त्था हि सोम॑ इ॒न्मदो॒ ब्रह्म॑ च॒कार॒ वर्ध॑नम्। शवि॑ष्ठ व॒ज्रिन्नोज॑सा पृथि॒व्या निः शशा॒ अहि॑मर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥२ अर्थात् "हे बलवान् शस्त्रधारी योद्धा पुरुष ! अपने राज्य का स्वागत करता हुआ, काले साँप के समान आक्रमण करने वाले भूमि के शत्रुओं का सत्यानाश कर, क्योंकि आनन्द में मग्न होकर स्तुति करने वाले इसी प्रकार तेरी उन्नति का वर्णन करते हैं।" १. सामवेद ४/४०९ २. सामवेद ४/४१०

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चम अध्याय 231 प्रेह्मभीहि धृष्णुहि न ते वज्रो नि यंः सते। इन्द्र नृम्णः हि ते शवो हनो वृत्रं जया अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम्॥१ अर्थात् "हे राष्ट्रपति ! कोई शत्रु तेरा शस्त्र नहीं रोक सकता। तेरा बल शत्रुओं को झुका देने वाला है। जैसे सूर्य मेघ को छिन्न-भिन्न कर जल की वर्षा करता है, ऐसे ही तू अपने शत्रुओं के सम्मुख जा, आक्रमण कर तथा उनका नाश करके अपने राष्ट्र की रक्षा कर।" यहाँ पर राष्ट्रपति का आशय किसी व्यक्ति विशेष के लिए न होकर राष्ट्र की एकता की शक्ति की ओर इंगित करके बताया जा रहा है कि राष्ट्र की संगठन शक्ति इतनी सबल होती है कि शक्तिशाली से शक्तिशाली शत्रु भी उसके आगे टिक नहीं सकता है। जब राष्ट्र की एकता की शक्ति शत्रु के सामने चट्टान की तरह अडिग खड़ी हो जाती है तो शत्रु अपनी पराजय स्वयं ही स्वीकार कर लेता है। यही वह सशक्त आधार है जिससे कि सदैव ही राष्ट्र की रक्षा होती रहती है। सामवेद के आधार पर कहा जा सकता है कि प्राचीन ऋषियों, मुनियों एवं विद्वानों ने इस बात की कल्पना कर ली थी कि ये आधार भविष्य के मानव जीवन को संचालित करने में सक्षम एवं पर्याप्त होंगे। अतः विचारणीय विषयों एवं समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हुए उन्होंने विचार प्रस्तुत किये थे जो आज देश की राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के तत्त्व हैं। वे उस काल में भी विचारणीय एवं आदर्श प्रस्तुत करने वाले समझे जाते थे, मात्र उनमें काल के अनुसार परिवर्तन हुआ है। २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में सामवेद के समाज- दर्शन का अनुशीलन : समाज के बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। जीवन का निवास ही समाज में होता है और उस समाज में रहकर जीवन व्यतीत करने के लिए उसके द्वारा बनाये गये नियमों का पालन मानव जीवन के लिए अनिवार्य होता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक की सारी क्रियायें समाज में ही घटित होती है। इस समाज की नैतिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि वैदिक काल में ही निश्चित कर दी गई थी और प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आज का समाज भी उसी का अनुकरण करता चला आ रहा है। इतनी स्पष्ट और सुनिश्चित परिकल्पना बनाई गई थी कि एक आदर्श समाज की रूपरेखा आज भी हमें परिलक्षित होती है। १. सामवेद ४/४१३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 232 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता प्राचीन समाजदर्शन का आदर्श ही वर्तमान में इसके अग्रिम अध्ययन का आधार बना। चाहे समाज की वर्ण-व्यवस्था हो, आश्रम-व्यवस्था हो या कि नारी और परिवार की स्थिति के बारे में निश्चित मानदण्ड हो, सभी का आधार आज भी हमारा वैदिक वाङ्ग्मय बना हुआ है। उस समय का समाजदर्शन आज के राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में अपना पृथक् स्थान रखता है। (क) वर्ण व्यवस्था :- समाज के सभी प्राणी समाज के अभिन्न अंग माने जाते हैं। इसमें सभी को समान अधिकार प्राप्त था। इसी का अनुकरण करके आधुनिक समाजशास्त्रियों ने भी समाज को एक जीवित शरीर माना है। १ समाजरूपी शरीर के चार अंगों में- मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य एवं पैरों से शूद्र की उत्पत्ति मानी जाती है। वैदिक काल में यह वर्ण व्यवस्था जन्म पर आधारित न होकर कर्म पर आधारित थी और जैसे शरीर के सभी अंग एक दूसरे के पूरक होते हैं और किसी भी अंग के बिना शरीर का कार्य संभव नहीं होता है, उसी प्रकार सभी वर्ण समाज के लिए अनिवार्य हैं। इन वर्णों के बारे में सामवेद में इसी प्रकार उल्लेख किया गया है परन्तु उसमें एक अन्य वर्ण का भी उल्लेख मिलता है- य आर्जिकेषु कृत्वसु ये मध्ये पस्त्यानाम्। ये वा जनेषु पञ्चसु॥ २ अर्थात् हे परमेश्वर ! जो प्राणी सरल स्वभाव वाली योनियों में हैं, जो गृहस्थ है अथवा जो पञ्चजनों में है, (चारों वर्ण पाचवाँ निषाद), वे हमारे लिए कल्याणकारी हों। चारों वर्णों को समाज की व्यवस्था संभालने का कार्यभार समर्पित था। ब्राह्मण वर्ण शिक्षा देने, यज्ञ कराने, दान आदि ग्रहण करने और नीति सम्बन्धी परामर्श देने वाला वर्ण था। चूँकि उसकी उत्पत्ति मुख से मानी जाती है अतः उसको सम्माननीय स्थान प्राप्त था। क्षत्रिय वर्ण का कार्य सुशासन स्थापना तो था ही, अन्य कार्य भी वे करते थे। वैश्यों के लिए पशुपालन, कृषि और वाणिज्य प्रमुख कार्य थे। परन्तु शस्त्र उठाने, देश की रक्षा करने में भी वे पीछे नहीं थे। शूद्र वर्ण के पास सभी वर्णों को सेवा शुश्रूषा करने का कार्य था। इसके बाद भी इन वर्णों में कहीं उच्च और निम्न होने की भावना नहीं पाई जाती थी और यही कारण है कि वे सभी वर्ण देश और समाज के स्थायी स्तम्भ थे। (ख) आश्रम व्यवस्था :- वैदिक काल में सम्पूर्ण मानव जीवन को चार भागों में विभाजित कर, महत्त्वपूर्ण दायित्वों की पूर्ति हेतु समयबद्ध कर दिया गया था। वह १. हर्बर्ट, स्पेन्सर इत्यादि। २. सामवेद ८/११६४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चम अध्याय 233 शिक्षा ग्रहण करने के काल में पूरे २५ वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए विद्याध्ययन का कार्य सम्पन्न करता था। सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् उसे गृहस्थाश्रम में प्रवेश की अनुमति दी जाती थी और गृहस्थाश्रम के पच्चीस वर्षों में वह अपने पुरुषार्थ की पूर्ति करता था। इसमें वह धर्म, अर्थ और काम, तीनों पुरुषार्थों का पालन करते हुए जीवन के अन्तिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति की कामना करता था। अपघ्नन्वते मृधोऽप सोमो अराव्णः। गच्छन्निन्द्रस्य निष्कृतम्॥१ अर्थात् 'आत्मा अपने अन्तस् की बुराइयों एवं दुर्गुणों का नाश करता हुआ उसे पवित्र करता है और उसके पश्चात् ही वह आत्मा मोक्ष प्राप्त करता है।' इससे पूर्व व्यक्ति अपने जीवन की परिपक्वावस्था में गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होता है। इस आश्रम में वह अपनी तीनों एषणाओं में से वित्तेषणा और पुत्रेषणा की पूर्ति करता है। इन एषणाओं की पूर्ति से उसकी आत्मा पूर्ण संतुष्ट हो जाती है तब वह लोकेषणा का त्याग करना चाहता है। परन्तु गृहस्थाश्रम में अनुभूत अनुभवों पर वह क्या-क्या चाहता है, यह निम्न मंत्र द्वारा स्पष्ट किया गया है- अक्रांत्समुदः प्रथमे विधर्मं जनयन् प्रजा भुवनस्य गोपाः। वृषा पवित्रे अधि सानो अव्ये बृहत्सोमो वावृधे स्वानो अद्रिः॥२ अर्थात् 'गृहस्थाश्रम में अपनी सन्तान और इन्द्रियों का आधार पवित्र धर्म को मानकर प्रजा (पुत्र-पौत्र) को उत्पन्न करने वाले, संसार के नियम का पालन करने वाले, रक्षा के योग्य तथा सच्चा आचरण करने वाले पर कृपा की वर्षा करने वाले, शब्द, स्पर्श आदि से सीधा सम्बन्ध रखने वाले, महान् जीवन धारण करने वाले, आदर के योग्य जीवात्मा अपनी शक्ति से उन्नति करता है।' इसमें गृहस्थाश्रम के दायित्वों एवं कामनाओं का पूर्ण उल्लेख किया गया है। इस आश्रम में रहते हुए भी सबसे अधिक उत्तरदायित्व, कर्तव्यों एवं धर्म के पथ पर चलते हुए सद्मार्ग पर अग्रसर होते रहना पड़ता था। पुरुषार्थों की पूर्ति भी इसी में रहकर करनी पड़ती थी जैसा कि उल्लिखित है- पुरूतमं पुरूणामीशानं वार्याणाम्। इन्द्र सोमे सचा सुते॥३ अर्थात् "सभी आश्रमों में प्रसिद्ध गृहस्थाश्रम में रहते हुए हम सब दुःखों के दमन करने वाले, वरण करने योग्य गुणों के स्वामी परमेश्वर का भजन करते हैं।" १. सामवेद ५/५१० २. सामवेद- पूर्वार्चिकः ५/५२९ ३. सामवेद- उत्तरार्चिकः १/७४१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

234 | वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता

इस प्रकार जीवन के पचास वर्ष ब्रह्मचर्य और गृहस्थाश्रम की पूर्ति में सम्पूर्ण हो जाते हैं। तृतीय आश्रम वानप्रस्थ में गृह के प्रति मोह त्याग कर घर में ही रहते हुए अपना सम्पूर्ण समय पूजा-अर्चना में व्यतीत करने का आदेश दिया गया है। वानप्रस्थ पूर्ण होने पर संन्यास आश्रम में गृह त्याग कर वन में जाकर फलाहार आदि के सहारे जप-तप में एकाकी जीवन व्यतीत करते हुए मोक्ष प्राप्ति का प्रयास करना चाहिये। मोक्ष मानव जीवन का अन्तिम लक्ष्य माना गया है जहाँ आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है, ऐसा उल्लेख है। (ग) पुरुषार्थ चतुष्टय :- पुरुषार्थ का सम्बन्ध व्यक्ति के जीवन में किये जाने वाले कर्त्तव्यों और धर्मों से है। वेदों में ही उसके जीवन को चार पुरुषार्थों में विभाजित कर दिया गया था। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। धर्म का पालन जीवन पथ का प्रथम और अन्तिम सन्देश होता था। इसी की छत्रछाया में सारे कार्यों को सम्पन्न करना होता था। गृहस्थाश्रम धार्मिक कृत्यों की पूर्ति करते हुए ईश्वर की प्राप्ति के लिये तथा पितृ, देव तथा ऋषि ऋण से मुक्त होने की प्रेरणा भी प्रदान करता है— पर्यू षु प्र धन्व वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः। द्विषस्तरध्या ऋणया न ईरसे॥१ अर्थात् हे परमेश्वर! बल और अन्न की प्राप्ति, कामादि शत्रुओं से तरने के लिये पापों का नाश करने वाला तू, हमें पितृ, देव तथा ऋषि ऋण से अवगत कराता है और उससे मुक्ति पाने के लिये हमें प्रेरित करता है। पुरुषार्थों के द्वारा ही वह जगत् के कल्याण करने का प्रयास करता है। यह सभी व्यवस्थायें जीवन को संयमित एवं मर्यादित करने के लिये निश्चित की गई हैं। वह अर्थोपार्जन करता है, तो धर्मानुसार। अधर्म से अर्जित किये गये धन से यज्ञ आदि कर्म भी सफल नहीं हो सकते हैं। अर्थ अर्जित करने का उद्देश्य भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए व्यय करना नहीं है अपितु धार्मिक कृत्यों, यज्ञ, दान, आदि में व्यय करना है। काम पुरुषार्थ की व्यवस्था का सीधा सम्बन्ध गृहस्थ आश्रम से जुड़ा हुआ है। काम मात्र वासनाओं की पूर्ति का साधन नहीं अपितु सृष्टि को कायम रखने की परम्परा की भी पूर्ति करने से है। पति-पत्नी दोनों के ही द्वारा इसे धार्मिक कृत्य समझकर ही पूर्ण किया जाता है। मोक्ष का सम्बन्ध शेष तीन पुरुषार्थों से अलग है क्योंकि उन सभी की पूर्ति के पश्चात् मोक्ष के लिए जप, तप करने का आदेश किया गया है और इसके लिए वह सांसारिक मोह-माया आदि से मुक्त हो जाता है।

१. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४२८ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चम अध्याय 235 नारी की स्थिति- वैदिक काल में पुरुष एवं स्त्री में कोई भेद नहीं किया गया था क्योंकि बचपन से ही बालक एवं बालिकाओं के विकास में समान दृष्टिकोण अपनाया गया था। उन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए शिक्षा देने का प्राविधान था। गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने पर वे गृह की सुव्यवस्था, बच्चों के समुचित लालन-पालन के साथ ही अग्निहोत्र में भाग लेती हुई पति के धर्मानुष्ठान में भी साहचर्य निभाती थीं। उनको पूर्ण सम्मान प्राप्त था, उनके बिना सुगृह की कल्पना नहीं की जा सकती थी— महे नो अद्य बोधयोषो राये दिवित्मती। यथा चित्रो अबोधयः सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते॥१ अर्थात् हे श्रेष्ठ गुणों वाली! धागे के समान सन्तान का विस्तार करने वाली! सत्य और मधुर बोलने वाली कुलीन स्त्री! मनुष्य जैसे चमकती हुई उषा देवी के उदय होने पर महान् धन के उपार्जन के लिए अपने-अपने कामों में लग जाते हैं, ऐसे ही आज तू भी सम्पत्ति, विद्या तथा सच्ची कीर्ति के लिए ज्ञान का प्रकाश दें। उषस्तच्चित्रमा भरास्मभ्यं वाजिनीवति। येन तोकं च तनयं च धामहे॥२ अर्थात् "हे धन आदि का संचय करने वाली उषा के तुल्य पवित्राचरण युक्त स्त्री ! तू हमें वह सौभाग्य दे जिससे कि हम पुत्र और पौत्र को भी धारण कर सकें।" स्त्री को समाज में सम्मानीय स्थान देना उस राष्ट्र के निर्माण में एक सकारात्मक पग है क्योंकि भावी नागरिकों की प्रथम शिक्षक माँ ही होती है और माँ द्वारा दी गई शिक्षा अबोध मस्तिष्क पर अपना प्रभाव जीवनपर्यन्त बनाये रखती है। स्त्री कभी भी अपने पुत्र एवं पुत्रियों को विघटनात्मक पथ पर जाने का परामर्श या शिक्षा नहीं दे सकती है। ५. विवाह :- मानव जीवन में विवाह मात्र एक संस्कार नहीं है अपितु उसका सम्बन्ध धर्म, देश और काल सभी को प्रभावित करने वाला होता है। बाल विवाह जैसी कुप्रथा उस समय नहीं पाई जाती थी। विवाह वर और कन्या दोनों के ही पूर्ण यौवन प्राप्त करने पर एवं शिक्षा पूर्ण होने पर ही होता था। कन्या को सुयोग्य पति चयन की स्वतंत्रता प्राप्त थी। वर्ण का भेद इसमें कोई स्थान नहीं रखता था। अग्निं होतारं मन्ये दास्वन्तं वसोः सूनूँ। सहसो जातवेदसं विप्रं न जातवेदसम्॥ १. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४२१ २. सामवेद- उत्तरार्चिकः १९/१७३१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 236 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता य ऊर्ध्वाया स्वध्वरो देवो देवाच्या कृपा। घृतस्य विभ्राष्टिमनु शुक्रशोचिष आजुह्वानस्य सर्पिषः॥१ अर्थात् ' हे कन्ये ! जो पुरुष उत्तम विद्या से कल्याणकारी यज्ञ करने वाला हो, विद्वानों को प्राप्त होने वाली ईश्वर की कृपा से मनोहर हो, जो होम के लिए प्राप्त करने में योग्य शुद्ध पवित्र घी के साथ अनेक प्रकार के पदार्थ को पकाने वाली अग्नि के समान तेजस्वी हो, जो प्रसिद्ध विद्वान् पुरुष के समान विद्या को भी प्रकट करने की शक्ति रखता हो, मैं ऐसे पुरुष को ही पति स्वीकार करती हूँ, तू भी ऐसा ही कर।' इस तरह विवाह संस्कार में जाति या वर्ण का कोई भी अवरोध नहीं था। इस तरह की स्वतंत्रता लोगों के मध्य वैमनस्य या संकीर्णता की भावना उत्पन्न नहीं होने देती है और सम्पूर्ण विश्व हमारा परिवार है, ऐसी भावना जागृत होती है और ये सभी स्थितियाँ देश की एकता और अखण्डता के लिए काल में पाये जाने वाले सकारात्मक घटक कहें जायेंगे। ३. राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में सामवेद के राजदर्शन का अनुशीलन- सामवेद काल में राजनैतिक व्यवस्था भी आदर्श थी, जिसमें सम्पूर्ण राष्ट्र में एकता एवं अखण्डता की भावना की अनुभूति होती थी। वैदिक काल में स्वराज्य शासन प्रणाली का प्राविधान दृष्टिगोचर होता है। स्वराज्य का वास्तविक अर्थ है- "आत्म नियंत्रण या स्वयं के ऊपर शासन। जहाँ मानव स्वशासित होता है वहाँ पर किसी अन्य नियंत्रण की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती है। राजा के बारे में एक आदर्श व्यक्ति का स्वरूप चित्रित मिलता है जो कि परम हितैषी, न्यायकारी, विद्वान् पुरुष ही हो सकता है और ऐसे राज्य में सुख शान्ति की ही कल्पना की जा सकती है- यः रक्षन्ति प्रचेतसो वरुणो मित्रो अर्यमा। न किः स दभ्यते जनः॥२ अर्थात् हे मनुष्यों ! हितैषी, न्यायकारी राजा और उत्तम ज्ञानी पुरुष जिस मनुष्य की रक्षा करते हैं, कोई उन्हें हानि नहीं पहुँचा सकता है। जिस राष्ट्र का राजा ही योग्य व न्यायी होगा उसकी समृद्धि और सुख शान्ति पर सन्देह नहीं किया जा सकता है। स्थान-स्थान पर राजा के लिए कर्त्तव्यों के निर्देश दिये गये हैं- १. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४६५ २. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः २/१८५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

पञ्चम अध्याय $\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad$ 237 कदा वसो स्तोत्रꣳहर्यत आ अव श्मशा रुधद्वाः। दीर्घꣳ सुतं वाताप्याय॥$^{१}$ अर्थात् हे ऐश्वर्यवान् राजन्! जब कभी जल-वृष्टि रुक जावे, तब वेदप्रेमी महान् प्रजावर्ग को जल प्रदान करने के लिए नहर बनवाओ। योनिष्ट इन्द्र सदने अकारि तमा नृभिः पुरुहूत प्र याहि। असो यथा नोऽविता वृधश्चिद्ददो वसूनि ममदश्च सोमैः॥$^{२}$ अर्थात् 'हे राष्ट्रपति! सभा के स्थान में तेरा मंच बना दिया गया है। हे बहुमत प्राप्त करने वाले! तू सहायक मनुष्यों के साथ उस मंच पर विराजमान हो, जिस प्रकार हमारी रक्षा और उन्नति कर सके, कर। हमें हमारी सम्पत्तियाँ दे और स्वयं भी योग्य पदार्थों से तृप्त हो।' स्वादोरित्या विषूवतो मधोः पिबन्ति गौर्यः। या इन्द्रेण सयावरीर्वृष्णा मदन्ति शोभथा वस्वीरनु स्वराज्यम्॥ $^{३}$ "हे ईश्वर! (सारी प्रजायें) धन-धान्य से पूर्ण पृथिवी पर प्रजातंत्र शासन होने पर उसी प्रकार तृप्त और प्रसन्न होती हैं, जिस प्रकार वर्षा करने वाले सूर्य के साथ चलने वाली किरणें स्वादिष्ट और मधुर जल ग्रहण करती और लोगों को सुखी करती हैं।" प्रजातंत्र शासन की अवधारणा उस समय भी विद्यमान थी और इसी को सर्वश्रेष्ठ भी माना जाता था। अनावश्यक अतिक्रमण या अधिकारों का हनन किसी भी समय अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था। आज का प्रजातंत्र और राष्ट्र की एकता और अखण्डता का सन्देश वैदिक युग से ही प्राप्त किया गया प्रतीत होता है। राष्ट्र का स्थान व्यक्ति के जीवन में सर्वोपरि रहा है। राष्ट्र की शत्रुओं से रक्षा करना सबका एक मात्र ध्येय रहता था। प्रेहाभीहि धृष्णुहि न ते वज्रो नि यꣳ सते। इन्द्र नृम्णाꣳ हि ते शवो हनो वृत्रं जया अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम्॥$^{४}$ अर्थात् हे राष्ट्रपति! कोई शत्रु तेरे शस्त्र को नहीं रोक सकता। तेरा बल शत्रुओं को झुका देने वाला है। जैसे सूर्य मेघ को छिन्न-भिन्न कर जल की वर्षा करता है, ऐसे १. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः २/२२८ २. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः २/३१४ ३. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४०९ ४. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४१३

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 238 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता ही तू अपने शत्रुओं के सम्मुख जा, आक्रमण कर तथा उनका नाश करके अपने राष्ट्र की रक्षा कर। राष्ट्र की रक्षा उसकी अखण्डता से जुड़ी हुई है और इसी के लिए सम्पूर्ण राष्ट्र एक होकर शत्रुओं का सामना करने के लिए तैयार रहता है। वेदों में राष्ट्र-भक्तों को मातृभूमि के पुत्र और पृथिवी को उनकी माता बतलाया गया है। इसी भावना का विकास करते हुए ही कहा गया है कि राष्ट्र के निवासियों में किसी भी प्रकार की ज्येष्ठता और कनिष्ठता की भावना नहीं होना चाहिए और सामान्य रूप से प्रयत्नशील होते हुए राष्ट्र की उन्नति में तत्पर रहना चाहिये। ऐसे ही विचारशील मनुष्यों से राष्ट्र उत्तम फल की आशा कर सकता है जो राष्ट्र की सामूहिक हित की कामना को पूर्ण करने में सक्षम हो सकते हों। परमेश्वर से यही प्रार्थना की गयी है कि इस प्रकार की भावना जनमानस में अधिकाधिक रूप से विद्यमान हो। इसी प्रकार किसी नवोदित देश या राष्ट्र का सहज कल्याण हो सकता है। इस प्रकार की उदात्त भावना का शुद्ध रूप हमें अपने देश भारतवर्ष के संविधान की प्रस्तावना या घोषणा पत्र में भी दृष्टिगोचर होता है जो कि उसके सबसे प्रथम मुखपृष्ठ पर ही इस प्रकार अंकित है— "भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुसत्ता सम्पन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख २६ नवम्बर १९४९ ई० (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल ६ सम्वत् २००६ वि०) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।" इसमें समाहित सभी गुण हमें वैदिक काल के राजदर्शन से ही प्राप्त हो रहे हैं। ४. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में सामवेद के धर्मदर्शन का अनुशीलन- भारत में मानव जीवन की संचालनशक्ति धर्म को ही माना गया है और यही कारण है कि व्यक्ति आज भी धार्मिकता से अपने आपको पृथक् नहीं कर पाता है। वह पाप और पुण्य की अवधारणा में बँधा हुआ है। वैदिक साहित्य में तो जीवन के उद्देश्यों में प्रमुख 'धर्म' को ही माना गया था, कालान्तर में इसके स्वरूप में परिवर्तन CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

पञ्चम अध्याय 239

अवश्य हुआ लेकिन मानवमस्तिष्क में आज भी इसका प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित है। सामवेद में इसके बारे में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है— प्र भूर्जयन्तं महां विपोधां मूरैरमूरं पुरां दर्माणम्। नयन्तं गीर्भिर्वना धियं धा हरिश्मश्रुं न वर्मणा धनर्चिम्॥१ अर्थात् 'हे मनुष्य ! तू भूमि के चलाने वाले, महान् बुद्धिमानों के रक्षक, मूर्खों के द्वारा न जानने योग्य, मूल रहित वेदवाणी द्वारा, ज्ञान और रक्षा द्वारा, प्रशंसनीय सुख को प्राप्त कराने वाले सूर्य के समान धनों के स्वामी परमेश्वर को धारण कर।' मा नो हृणीथा अतिथिं वसुरग्निः पुरुप्रशस्त एषः। यः सुहोता स्वध्वरः॥२ अर्थात् हे मनुष्य ! जो परमेश्वर उत्तमदाता कल्याणकारी यज्ञ का स्वामी, सब का बसाने वाला तथा अत्यन्त प्रशंसनीय है, उस हमारे पूजनीय देव के प्रति क्रोध या अनादर का भाव मत करो। ईश्वर सदैव पूजनीय है, उसका स्वरूप अवर्णनीय है। वह सदैव ही मानव मात्र का सहायक होता है। उसकी स्तुति से सदैव कल्याण ही होता है। उसकी आराधना करते हुए संसार में सद्कर्मों और परोपकार में ही जीवन व्यतीत करना उचित होता है। पाप कर्मों का त्याग, जीव मात्र के प्रति दया, यज्ञ और स्तुतियों के द्वारा परमेश्वर की आराधना ही जीवन के प्रमुख उद्देश्यों में समाहित होना चाहिए। जीवन की पूर्णता इसी में व्याप्त है। वृत्रस्य त्वा श्वसथादोषमाणा विश्वेदेवा अजहुर्ये सखायः। मरुद्भिरिन्द्र सख्यं ते अस्त्वथेमा विश्वाः पृतना जयासि॥३ अर्थात् हे जीवात्मा ! जो इन्द्रियाँ तेरी मित्र होती हैं, वे भी पाप के श्वास से ही प्रभावित होकर तेरा साथ छोड़ देती है। केवल प्राण ही तेरे साथी होते हैं। जब ये साथ देते हैं तो पाप की सारी सेना को तू जीत लेता है। त्वं ह त्यत्सप्तभ्यो जायमानोऽशत्रुभ्यो अभवः शत्रुरिन्द्र। गूढे द्यावापृथिवी अन्वविन्दो विभुमद्द्भ्यो भुवनेभ्यो रणं धाः॥४


१. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः १/७४ २. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः १/३४ ३. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः १/३२४ ४. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ३/३२६

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 240 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् हे जीव! तू मित्ररूप सात इन्द्रियों के लिए उत्पन्न होकर भोगों में फँसा हुआ उनका शत्रु बन जाता है। तू अत्यन्त गूढ़, द्यु एवम् पृथिवी लोक में भी कर्मानुसार प्राप्त होता है। तू ऐश्वर्यशाली लोकों की प्राप्ति के लिए जीवन संग्राम को धारण करता है। जीवन में ज्ञान और कर्म का उपदेश ही महत्त्वपूर्ण है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार कर्मों का फल मनुष्य को सदैव ही प्राप्त होता है। सद्कर्मों का फल जीवन में सद् ही प्राप्त होता है और दुष्कर्मों का फल सदैव बुरा ही हो सकता है। इस अवधारणा से व्यक्ति का जीवन भी नियंत्रित होता है क्योंकि उसे कर्मफल का भय सदैव ही भयभीत करता रहता है। अचेत्यग्निश्चिकितिर्हव्यवाट् न सुमद्रथः॥१ अर्थात् "परमात्मा को सब जानते हैं और वह भी सबको जानता है। परमात्मा मनुष्यों को उनके भले और बुरे कर्मों के फल तथा योग्य पदार्थों को देता है। शुद्ध ज्ञान ही भगवान् का रथ है।" धर्म के अनुसार मनुष्य की अन्तिम गति मोक्ष प्राप्त करने की होती है और वह इस शाश्वत सत्य को कभी नहीं भूलता कि मृत्यु अवश्यम्भावी है और उसे मोक्ष प्राप्ति हेतु जप-तप करने में रत रहना है। यह उसके जीवन का महत्त्वपूर्ण चरण होता है। तरत्स मन्दी धावति धारा सुतस्यान्धसः। तरत्स मन्दी धावति॥२ अर्थात् जो पुरुष अन्नरूप सुन्दर गिरायी हुई सोमरस की धारा से यज्ञ करता हुआ परमेश्वर की स्तुति करता है, वह स्तुति करने वाला अवश्य ही तर जाता है। अर्थात् उत्तम गति पाता है। एते असृग्रमिन्दवस्तिरः पवित्रमाशवः। विश्वान्यभि सौभगा॥३ अर्थात् सब शुभगुणों से युक्त यज्ञ, दुःखों से पार लगाने वाले पवित्र निष्काम कर्म और समस्त संपदाओं की प्राप्ति के उद्देश्य से किये जाते हैं। इस प्रकार सामवेद में वर्णित धर्मदर्शन अन्य वेदों से पृथक् नहीं है। वेदों के अनुसार मानव जीवन धर्माचरण से युक्त नैतिकता की प्रमुखता वाला था। इसमें ईश्वर, राष्ट्र, परिवार सभी की महत्ता को स्वीकार किया गया है। राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में इस दर्शन के अनुसार इस भावना को दृढ़ता प्राप्त १. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४४ २. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ५/५०० ३. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः ४/८३० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar