भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 253

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri चतुर्थ अध्याय 225 स्पष्ट होता है कि नागरिकों की पृष्ठभूमि ऐसी बनाई जाती है कि वे देशहित और मानवहित को कभी उपेक्षित ही नहीं कर सकते हैं। अर्थ-दर्शन :- वैदिक युग में आर्थिक अवस्था अत्यन्त सुविकसित होती है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को सुचारु गति देने के लिए उस देश की कृषि और खनिज सम्पदा का विशेष महत्त्व होता है। आर्थिक दृष्टि से पृथिवी के प्रति पूर्ण जागरुकता विद्यमान थी। तत्कालीन आर्यगण इस तथ्य से अवगत थे कि पृथिवी वसुधा ही नहीं विश्वम्भरा (सबका भरण-पोषण करने वाली) भी है। वह हिरण्यवक्षा (अपने गर्भ में स्वर्णादि की खानों को छिपाये हुए) है। उस पृथिवी से मातृवत् पालन करने की प्रार्थना की गई है— 'सा नो भूमिर्विंसृजतां माता पुत्राय मे पयः। इस पृथिवी पर उत्पन्न प्राणियों के भरण-पोषण का दायित्व मातृभूमि पर ही होता है।' सी॒रा यु॒ञ्जन्ति क॒वयॊ यु॒गा वि॑तन्वते॒ पृथ॑क्। धीरा॑ दे॒वेषु॑ सुम्न॒या।।१ अर्थात् मनुष्यों को चाहिए कि विद्वानों की शिक्षा से कृषि कर्म की उन्नति करें। जैसे योगी नाड़ियों में परमेश्वर को समाधियोग से प्राप्त होते हैं, वैसे ही कृषि कर्म द्वारा सुखों को प्राप्त होवें। लाङ्ग॑लं पवी॑रवत्स॒शेव॑नं सोम॒पित्स॑रु। तदुद्व॑पति॒ गामविं॑ प्र॒फर्व्यं॑ च॒ पीवरीं॑ प्र॒स्थाव॑द्रथ॒वाह॑नम्।।२ अर्थात् "किसान लोगों को उचित है कि मोटी मिट्टी, अन्न आदि की उत्पत्ति से रक्षा करने वाली पृथिवी की अच्छी तरह से परीक्षा करके, हल आदि साधनों से समतल कर, सुन्दर संस्कारित बीजों से उत्तम धान्य उत्पन्न करके भोगें।" यजुर्वेद में पशुपालन को वैयक्तिक आधार पर ही नहीं अपितु व्यावसायिक आधार पर भी उचित माना गया था इसीलिये इसका उल्लेख प्राप्त होता है। अर्मेभ्यो हस्ति॒पं ज॒वाया॑श्व॒पं पुष्ट्यै॑ गो॒पालं वीर्या॑याविपा॒लं तेज॑सेऽजपा॒लमिरा॑यै की॒नाश॑ं। की॒लाला॑य सुरा॒कारं॑ भ॒द्राय॑ गृ॒हप॑थं॒ श्रेय॑से वित्त॒धमाध्य॑क्ष्यायानुक्ष॒त्तार॑म्।।३ अर्थात् राजपुरुषों को चाहिए कि अच्छे शिक्षित हाथी आदि को रखने वाले पुरुषों को ग्रहण कर इनसे बहुत से व्यवहार सिद्ध करें। १. यजुर्वेद १२/६७ २. यजुर्वेद १२/७१ ३. यजुर्वेद ३०/११ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar