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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 252

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 224 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता शिक्षा के प्रति अध्यापक और अध्येता दोनों के ही दायित्वों का पृथक्-पृथक् वर्णन किया गया है। पुरुष एवं स्त्री दोनों के लिए ही समस्त शिक्षा की व्यवस्था की गई थी। लिंग के भेद को कहीं भी महत्त्व प्रदान नहीं किया गया था और न ही स्त्री को अबला के रूप में वर्णित किया गया है। ब्रह्मा॑णि मे मतयः॒ शथं॑ सु॒तासः॒ शुष्म॑ इयर्ति प्रभुतो मे॒ अद्रि॑ः। आ शा॑स॒ते प्रति॑ हर्यन्त्यु॒क्थेमा हरी॑ वहत॒स्ता नो॒ अच्छ॑।।१ अर्थात् हे विद्वानों ! जिस कर्म से विद्या और मेघ की उन्नति हो, वैसी क्रिया करों। जो लोग तुम से विद्या और सुशिक्षा चाहते हैं उनको प्रेमपूर्वक दों, और जो आपसे अधिक विद्या वाले हों उनसे तुम विद्या ग्रहण करों। यजुर्वेद में शिक्षकों और उपदेशकों के लिए नियम निश्चित किये गए थे, जिनका अनुकरण ही उनको समाज व विद्यार्थियों के मध्य पूजनीय बनाता था। गुरु प्रथम पूज्य होता था। मनुष्य को ज्ञानी बनाने का कार्य गुरु के द्वारा ही सम्पन्न किया जाता था। दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्। आ द॑दे॒ नारि॑रसि।।२ अर्थात् हे मनुष्यों, तुम लोग उत्तम विद्वानों को प्राप्त होकर उनसे विद्या-शिक्षा ग्रहण कर इस सृष्टि में नायक बनो॑! विश्वा॒ आशा॑ दक्षिणस॒द्भिर्ऋ॒ दे॒वान्या॑ऽडिह। स्वाहा॑वृतस्य घ॒र्मस्य॒ मधो॑ः पिबतमश्विना।।३ अर्थात् उपदेशक शिक्षा दें और अध्यापक पढ़ावें, वैसे ही सब लोग ग्रहण करें। वैदिक काल की शिक्षा ने संतुलित एवं सुशिक्षित व्यक्ति के निर्माण का सदैव उपदेश दिया है। सभी तरह से शिक्षित एवं उन्नत विचारों वाले व्यक्ति देश की उन्नति व प्रगति के लिए सहयोग प्रदान करते हैं। जहाँ सभी लोगों को उच्चकोटि के विद्वानों द्वारा शिक्षा प्राप्त होती है, वे संकीर्णता और दुष्ट प्रवृत्तियों से अलग रहते हैं। राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यदि यजुर्वेद के शिक्षा दर्शन को देखा जाय तो १. यजुर्वेद ३३/७८ २. यजुर्वेद ३७/१ ३. यजुर्वेद ३८/१० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar