वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 251, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
चतुर्थ अध्याय 223 अर्थात् ईश्वर आज्ञा देता है कि विद्वान् पुरुष एवं स्त्रियों को चाहिए कि विद्यार्थी कुमार या कुमारी को विद्या देने के लिए गर्भ के समान धारण करें। जैसे क्रमशः गर्भ के बीच देह बढ़ता है वैसे अध्यापक लोगों को चाहिये कि अच्छी शिक्षा से ब्रह्मचारी, कुमार या कुमारी को श्रेष्ठ विद्या में वृद्धियुक्त करें तथा (उनका) पालन करें। वे विद्या के योग से धर्मात्मा और पुरुषार्थयुक्त होकर सदा सुखी हों, यह अनुष्ठान सदैव करना चाहिये। रेव॑ती रम॑ध्वं॒ बृह॑स्पते धा॒रया॒ वसू॑नि। ऋ॒तस्य॑ त्वा देवहविः पाशेन॒ प्रति॑ मुञ्चामि॒ धर्षा॒ मानु॑षः॥१ अर्थात् विद्वानों को अपनी शिक्षा से कुमार ब्रह्मचारी और कुमारी ब्रह्मचारिणियों को परमेश्वर से लेकर पृथ्वीपर्यन्त पदार्थों का बोध कराना चाहिए, जिससे वे अज्ञानरूपी बन्धन को छोड़कर सदा सुखी रहें। यजुर्वेद में शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता है क्योंकि जीवन में ज्ञान की कोई सीमा नहीं है, परमेश्वर से लेकर पृथ्वी तक के किसी भी वस्तु के गूढ़ज्ञान हेतु प्रयत्न करना और जिज्ञासा की प्रवृत्ति उनमें उत्पन्न होना ही ग्रहण करने की क्षमता का द्योतक है। शिक्षा ग्रहण काल में ब्रह्मचर्य का पालन अत्यन्त अनिवार्य है। इस आयु में ही उन्हें सत्याचरण, धर्माचरण, संयम एवं त्याग से परिचित करा दिया जाता है और यही आधारशिला उनके भविष्य के लिए होती है। वे अच्छे व्यक्ति, नागरिक, माता-पिता, पुत्र-पुत्री के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करते हैं। वाचं॑ ते शुन्धामि प्रा॒णं तें शुन्धामि॒ चक्षु॑स्ते शुन्धामि॒ श्रोत्रं॑ ते शुन्धामि॒ नाभिं॑ ते शुन्धामि॒ मेढ्रं॑ ते शुन्धामि पा॒युं तें शुन्धामि च॒रित्रौ॑स्ते शुन्धामि॥२ अर्थात् गुरु और गुरु पत्नियों को चाहिए कि वेद और उपवेद तथा वेद के अंग और उपांगों की शिक्षा में देह, इन्द्रिय, अन्तःकरण और मन की शुद्धि, शरीर की पुष्टि तथा प्राण की संतुष्टि देकर समस्त कुमार और कुमारियों को अच्छे-अच्छे गुणों में प्रवृत्त करावें। वेद-वेदांगों में शिक्षा का पूर्ण प्राविधान था। दर्शन, मनोविज्ञान, विज्ञान, योग, संगीत, कला आदि सभी की शिक्षा ग्रहण करने के बारे में उल्लेख प्राप्त होते हैं। १. यजुर्वेद ६/८ २. यजुर्वेद ६/१४
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar