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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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चतुर्थ अध्याय 227 आ त्वाहार्षमन्तरम् ध्रुवस्तिष्ठा विचाचलिः। विश सूत्वा सर्वा वाञ्छन्तु या त्वद्राष्ट्रमधिभ्रशत्॥ १ अर्थात् 'हे अग्ने! मैं तुमको लाया हूँ, तुम भीतर हो (नाभि के ऊपर शरीर के मध्य में)। तुम चलनरहित हो स्थिर बैठो। सारी प्रजा तुम्हें चाहे। राष्ट्र अर्थात् जन समूह तुमसे गिरे नहीं।' इससे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि राष्ट्र में जनसमूह के विश्वास का कितना बड़ा स्थान है। राष्ट्र में श्रद्धा, उसकी एकता एवं अखण्डता के प्रति उद्घोष ही उसके अस्तित्व को चिरस्थायी रखने के लिए पर्याप्त है। यजुर्वेद में राजाओं को दिये गये निर्देशों के अनुसार वे अपनी प्रजा का पालन पुत्रवत् करें। अपने देश की उन्नति एवं समृद्धि के लिए यथोचित प्रयास करें। समाज के विद्वानों की सहायता से ही राज्य का शासनकार्य संचालित करें ताकि उनकी प्रजा को योग्य प्रजापालकों का संरक्षण प्राप्त हो और उनके अपने बहुमखी विकास में किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न हो। यही भावना प्रजा को एक निश्चितता प्रदान करती है और अच्छे राजा तथा विद्वान् मंत्रिगण एवं योग्य सेनापतियों के संरक्षण में वे अपने जीवन को सुरक्षित अनुभव करते हैं। उनके उत्तर में ही वे अपने राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के लिए स्वयं प्रयत्नशील होते हैं। उनकी भावनाएँ राष्ट्र के प्रति सीमाओं से नहीं अपितु उसकी मिट्टी से जुड़ी होती है। दुश्मनों की बुरी दृष्टि भी उन्हें स्वीकार नहीं होती है। यजुर्वेद में निर्देशित (७/२०)² मंत्र के अनुसार राजा और विद्वानों के लिए निश्चित किया है कि वे राज्य की निरन्तर उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहें। वे उपदेश और विद्या के प्रचार द्वारा ही अपनी प्रजा को अभिभूत कर सकते हैं। राजा, प्रजा और उत्तम विद्वानों की परस्पर प्रीति से ही ऐश्वर्य की उन्नति और आनन्द में वृद्धि होना संभव है। राष्ट्र में फैली अशिक्षा और विचारों की संकीर्णता ही राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के मार्ग में बाधक बन सकती है। जबकि यजुर्वेद में उल्लिखित मंत्रों के अनुरूप विद्या के प्रचार से ही हम उनके अन्तर में व्याप्त संकीर्णता, साम्प्रदायिकता, अशिक्षा को दूर करके उनके विचारों में समृद्धि ला सकते हैं और वे राष्ट्र की एकता के लिए मजबूत श्रृंखला बनाने में सक्रिय होंगे। राजनीति में १. वाजसनेयी संहिता १२/११ २. पूर्व में उल्लिखित

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar