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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 233

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय अध्याय 205 उसके संग से समस्त विद्याओं का सर्वथा निश्चय करें। वे विद्यायें अधिक उचित होती है जिनसे कि व्यक्ति के आन्तरिक गुणों का विकास हो सके और वह गुणवान् होकर स्वयं भी वैसी ही शिक्षा प्रदान करने में समर्थ हो सके।'' विद्या देने वालों के लिए भी ऋग्वेद में निर्देश दिया गया है कि शिक्षा का स्वरूप एवं उद्देश्य क्या हो? किस प्रकार की शिक्षा सर्वजनहिताय सिद्ध हो सकती है, उस बारे में ऋग्वेद में कहा गया है कि अध्यापकों और उपदेष्टाओं के लिए यह योग्य है कि विद्या और धर्म के उपदेश से सब जनों को विद्वान् धार्मिक करके पुरुषार्थयुक्त निरन्तर किया करें।१ ऋग्वेद में स्त्री-शिक्षा के प्रति भी पूर्ण ध्यान दिया गया है। उस समय स्त्री एवं पुरुष में कोई भेद नहीं किया गया था, अतः कुमारी कन्याओं की शिक्षा के लिए निर्देश है कि वे विदुषियों से शिक्षा ग्रहण करें और वे सभी कुमारी ब्रह्मचारिणी विदुषियों से प्रार्थना करें कि आप हम सबको विद्या और सुशिक्षा से युक्त करें।२ पुरुष विद्वानों को यदि ब्रह्मचारी कुमारों को शिक्षा प्रदान करनी चाहिये तो विदुषी स्त्रियों को ब्रह्मचारिणी कुमारियों को शिक्षा प्रदान करनी चाहिये। उन्हें अच्छी प्रकार शिक्षा प्रदान करनी चाहिये। सूर्य और भूमि जिस प्रकार सबको उन्नति देते हैं, उसी प्रकार विद्वानों को शिक्षार्थियों को ज्ञान प्रदान करना चाहिये।३ इस प्रकार शिक्षा से ही राष्ट्र का विकास होता है, उनमें ज्ञान आता है और राष्ट्र की महत्ता का उन्हें ज्ञान होता है। राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का भान होता है। अर्थदर्शन :- वैदिक युग में आर्थिक व्यवस्था अत्यन्त सुविकसित प्रतीत होती है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को सुचारु गति देने के लिए उस देश की कृषि और खनिज सम्पदा का विशेष महत्त्व होता है। आर्थिक दृष्टि से अर्थ का सबसे बड़ा स्रोत पृथिवी ही होती है। इसी पृथिवी के गर्भ से फसलें पैदा होती हैं, इसके गर्भ में खनिजों की खानें सुप्त होती हैं। जल के स्रोत भी पृथिवी के गर्भ में ही रहते हैं और यह सब मानव जीवन के आधार होते हैं। यदि पृथिवी को माँ कहा जाता है तो इसी दृष्टि से वह मातृभूमि होती है। अपनी सभी सन्तानों के लिए अन्न, फल-फूल आदि देने वाली वही होती है। ऋग्वेद में कृषि-कर्म और उसके उपकृत्यों का कई स्थानों पर वर्णन प्राप्त होता १. ऋग्वेद १/११२/१६ २. ऋग्वेद २/४१/१६ ३. ऋग्वेद २/४१/१७-२० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar