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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 231

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय अध्याय 203 मानव को भी आपस में सभी के साथ न्यायसंगत व्यवहार करना चाहिये। जो व्यक्ति विद्या-सम्पादन आदि कार्यों में संलग्न होते हैं वे सदा दूसरों को ज्ञान या विद्या प्रदान करने का कार्य करते हैं और उनके प्रयत्न सदा दूसरों का हित करने का ही होता है। ईश्वर ऐसे मनुष्यों को सदैव आशीर्वाद देता है जो मनुष्य विद्वान् होकर सबके प्रति परोपकार की भावना से हित पहुँचाने का प्रयास करते हैं और दूसरों को सुखी देखकर ही वे स्वयं अपने आपको सुखी अनुभव करते हैं। यु॒वाकु॒ हि शची॑नां यु॒वाकु॑ सुमती॒नाम्। भू॒याम॑ वा॒जदा॑व्नाम्॥१ अर्थात् मनुष्यों को सदा आलस्य छोड़कर अच्छे कामों का सेवन तथा विद्वानों का समागम नित्य करना चाहिये, जिससे अविद्या और दरिद्रता जड़ मूल से नष्ट हों। नमो॑ म॒हद्भ्यो॒ नमो॑ अर्भ॒केभ्यो॒ नमो॒ युव॑भ्यो॒ नम॑ आशि॒नेभ्य॑:। यजा॑म दे॒वान्यदि॑ श॒क्नवा॑म॒ मा ज्याय॑स॒: शंस॒मा वृ॑क्षि दे॒वाः॥२ अर्थात् "ईश्वर का यह उपदेश है कि मनुष्यों को चाहिये कि अभिशाप छोड़कर अन्नादि से सब उत्तम जनों का सत्कार करें अर्थात् जितना पदार्थ आदि उत्तम बातों से अपना सामर्थ्य हो उतना उनका संग करके विद्या प्राप्त करें किन्तु उनकी कभी निन्दा न करें।" परनिन्दा मानव के लिये शोभा नहीं देता है, यह सब आचार संगत नहीं है। सम्पूर्ण गुणों से युक्त व्यक्ति ही सर्वश्रेष्ठ मानव समझा जाता है। वि॒द्वांसा॑वि॒दुर॑: पृ॒च्छेदवि॑द्वान्नि॒त्थाप॑रो अचे॒ताः। नू चि॒न्नु मर्ते॒ अक्रौ॑॥३ अर्थात् "विद्वान् व्यक्तियों द्वारा दिये गये परामर्श के अनुसार ही दूसरों के साथ व्यवहार करें। सदैव विद्वानों को पूछकर सत्य और असत्य का निर्णय कर आचरण करें और झूठ का सदैव ही त्याग करें। इस बात में किसी को कभी आलस्य नहीं करना चाहिये क्योंकि बिना पूछे कोई नहीं जानता है, इससे किसी को मूर्खों के उपदेश पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये।" ब॒ळित्था तद्वपु॑षे धायि दर्शतं दे॒वस्य॒ भर्गो॒ सह॑सो॒ यतो जनि॑। यदी॒मुप॒ ह्वर॑ते॒ साध॑ते म॒तिर्ऋ॒तस्य॒ धेना॑ अनयन्त स॒स्रुतः॑॥१


१. ऋग्वेद १/१७/४ २. ऋग्वेद १/२७/१३ ३. ऋग्वेद १/१२०/२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar