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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 353 में से

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पृष्ठ 230

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 202 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता मन में सम्मान की भावना रखता है- आ यद्द्वा॑मीयचक्ष॑सा मि॒त्रं व॒यं च॑ सू॒र्यः॑। व्यचि॑ष्ठे बहु॒पाय्ये॑ यते॑महि स्व॒राज्ये॑।।१ अर्थात् मनुष्यों को चाहिए कि वह मित्रता करके सभी राज्यों के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार रखें तथा अपने और दूसरे राज्य के न्याय की रक्षा करते हुए धर्म की उन्नति करें। ५. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद के आचारदर्शन, शिक्षा दर्शन एवं अर्थदर्शन का अनुशीलन : राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद में जो आचारदर्शन प्रस्तुत किया गया है उससे एक अच्छी समष्टि प्रस्तुत करने के लिए आचार संहिता प्रस्तुत की गई है। अच्छे संस्कारों से ही व्यक्ति का अच्छा व्यक्तित्व बनता है और सद्चरित्र एवं सुसंस्कारों वाले नागरिकों से ही राष्ट्र का अखण्ड स्वरूप बनता है। उ॒त नः॑ सु॒भगाँ॑ अ॒रिवो॑चेयु॒र्दस्म॒ कृ॒ष्टय॑ः। स्यामेदिन्द्र॑स्य॒ शर्म॑णि।।२ अर्थात् "जब समाज में सभी व्यक्ति विरोध को छोड़कर दूसरों पर उपकार करने का प्रयत्न करते हैं तब शत्रु भी मित्र हो जाते हैं, जिससे सब मनुष्यों को ईश्वर की कृपा से निरन्तर उत्तम आनन्द प्राप्त होता है।" मानव मात्र के साथ बंधुत्व की भावना का विकास करके जब सबके साथ प्रेम, सहयोग और अपनत्व की भावना से पूर्ण होकर जीवन व्यतीत करते हैं तब एक सुगठित समाज और राष्ट्र का निर्माण होता है। इसके मध्य निजी हित कभी नहीं आता है। किसी के प्रति द्वेष की भावना रखना भी धर्म और आचार की दृष्टि से गलत है:- मा नो॒ मर्तों अभि द्रुहन् तनूना॑मिन्द्र गिर्वणः। ईशा॑नो यवया व॒धम् ।।३ अर्थात् कोई भी मनुष्य अन्यायपूर्ण ढंग से किसी का अहित करने की कभी न सोचे क्योंकि अन्याय का समर्थन न तो धर्म करता है और न ही आचार संहिता। इससे अच्छा यह है कि व्यक्ति परस्पर सबके साथ मित्र भाव बनाये रखें, क्योंकि बिना अपराध के ईश्वर भी किसी का तिरस्कार नहीं करता है। ठीक उसी प्रकार १. ऋग्वेद ५/६६/६ २. ऋग्वेद १/४/६ ३. ऋग्वेद १/५/१० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar