वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 229, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय अध्याय 201 ए॒ष वः॒ स्तोमो॑ मरुत इ॒यं गीर्मा॒न्दार्य॑स्य मा॒न्यस्य॑ का॒रोः। एषा या॑सीष्ट त॒न्वे॑ व॒यां वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥१ अर्थात् जो आप्त, शास्त्रज्ञ, धर्मात्मा विद्वान् पुरुषों की उत्तेजना से विद्या और शिक्षा को प्राप्त होकर धर्मयुक्त व्यवहार का आचरण करते हैं, उनके जन्म की सफलता है यह जानना चाहिये। इस तरह मानव जीवन की सफलता का श्रेय सदैव ही धर्म एवं विवेकपूर्ण आचरण को दिया गया है। यस्या॑व॒धीत्पि॒तरं॒ यस्य॑ मा॒तरं॒ यस्य॑ श॒क्रो भ्रात॑रं॒ नार्त ईष॑ते। वेतीद्व॑स्य॒ पर्य॑ता यतं॒करो॒ न किल्बि॑षादीषते॒ वस्व॑ आक॒रः॥२ अर्थात् "माता, पिता और भ्रातृ आदि का पालन करें तथा उनके पुत्र आदि को चाहिए कि वे निरन्तर सत्कार करें और पापाचरण का त्याग करके धर्म का पालन करते हुए इस प्रकार का आचरण करें कि वे सभी काल में सुखी होवें।" व्यक्ति अपने जीवन में धर्माचार्यों से धर्म की शिक्षा, वेद-शिक्षा, शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण करते हुए धर्म की सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करता है और उसका अनुकरण करते हुए अभीष्ट को प्राप्त करता है। इस अभीष्ट की प्राप्ति में ही मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन सफल होता है। ते हि स॒त्या ऋ॑त॒स्पृश॑ ऋ॒तावा॑नो जने॑जने। सु॒नी॒थासः॑ सु॒दान॑वो॒ऽहोश्चि॑द्रुरुच॒क्रयः॑॥३ अर्थात् "जो स्वयं धर्मयुक्त, गुण, कर्म और स्वभाव वाले होते हैं, दुष्ट आचरण से पृथक् व्यवहार करके अन्य मनुष्यों को तादृश अर्थात् अपने समान मानते हैं, वे धन्यवाद के योग्य हैं।" इस प्रकार यह स्पष्ट दृष्टिगोचर है कि ऋग्वेद में दी गई शिक्षा से यह प्राप्त होता है कि धर्मानुरूप आचरण, शिक्षा एवं ज्ञान के द्वारा इस तरह का वातावरण प्रस्तुत होता है कि राष्ट्र एक आदर्श राज्य बन जाता है और वह अपनी राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के प्रति ही निष्ठावान् नहीं रहता है अपितु वह दूसरे राष्ट्रों के लिए भी अपने
१. ऋग्वेद १/१६५/१५ २. ऋग्वेद ५/३४/४ ३. ऋग्वेद ५/६७/४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar