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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 228

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 200 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के काम और स्वभाव को मन में धारण करके सब प्राणियों के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करके सदा धर्म की उन्नति में अपना सहयोग प्रदान करना चाहिए।' मानव को स्वयं धर्म का आचरण करना चाहिये और दूसरे लोगों को भी इस कार्य के लिये प्रेरित करना चाहिये, ताकि उस समाज का वातावरण धर्ममय हो। धर्म से पृथक् कुछ सोचा ही नहीं जा सकता है। इससे पृथक् कुछ होना भी नहीं चाहिए क्योंकि जीवन का आरम्भ ही धर्ममय वातावरण से होता है। अ॒द्या दे॑वा॒ उदि॑ता॒ सूर्य॑स्य॒ निरंह॑सः पिपृ॒ता निर॑व॒द्यात्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धु॑: पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥१ अर्थात् "मनुष्यों का यह कर्तव्य है कि वे पाप की छाया से भी दूर रहें और धर्म का आचरण करते हुए परमपिता परमेश्वर की उपासना करें और उसी के अनुरूप जीवन व्यतीत करते हुए अपने पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) की परिपूर्ण सिद्धि करें।" वि यदस्या॑धृ॒जतो॒ वात॑चोदितो॒ ह्वारो॒ न वक्क्रा॑ जर॒णा अना॑कृतः। तस्य॑ प॒त्मन्त्कृ॒ष्णः कृ॑ष्ण॒जंह॑सः॒ शुचि॑जन्म॒नो रज॒ आ व्य॑ध्वनः॥२ अर्थात् धर्म जीवन की वह धुरी है जिस पर परिक्रमा करता हुआ मानव जीवन इस तरह प्रसिद्ध एवं यज्ञपूर्ण होता है जैसे कि सूर्य का यश सम्पूर्ण पृथ्वी को आलोकित करता है। उसी प्रकार व्यक्ति की कीर्ति चारों दिशाओं में फैलती रहती है। अस्ता॑व्य॒ग्निः शि॒मीव॑द्भि॒रर्कैः साम्ना॑ज्य॒य प्र॒तरं॑ दधा॑नः। अ॒मी च॒ ये म॒घव॑ानो व॒यं च॒ मिहं॒ न सूरो॒ अति॑ नि॒ष्टत॑न्युः॥३ अर्थात् जो मनुष्य धार्मिक विद्वानों से अच्छी शिक्षा को पाये हुए धर्म से राज्य का विस्तार करते हुए प्रयत्न करते हैं वे ही राज्य, विद्या और धर्म के उपदेशों का अच्छी प्रकार स्थापन करने के योग्य होते हैं। धर्म के मार्ग पर चलने वाले मनुष्य सदैव धर्म का प्रचार ही करते हैं और धर्म का विकास मानवीय प्रयासों का ही परिणाम होता है। जिस प्रकार अधर्म को छोड़कर धर्म अपनाकर ईश्वरीय अनुष्ठान करने से ईश्वर की प्राप्ति होती है उसी प्रकार उन्हें अपने जीवन में अतिरमणीय आनन्द की प्राप्ति होती है। १. ऋग्वेद १/११५/६ २. ऋग्वेद १/१४१/७ ३. ऋग्वेद १/१४१/१३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar