भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xviii अखिल भारतीय प्राच्य परिषद् पुणे, की आजीवन सदस्या के रूप में स्वदेश-भारत एवं विदेशों में भी आयोजित संस्कृत-सम्मेलनों में उपस्थित होकर अपने मौलिक संस्कृत शोधपत्रों को प्रस्तुत किया तथा परिषदीय-अध्यक्षों व श्रोतृसमूह से प्रशस्ति- पत्र प्राप्त किये। यह मेरे इन्हीं प्रातःस्मरणीय श्रद्धेय गुरु से प्राप्त प्रेरणाओं का ही प्रतिफल है। तत्पश्चात् मैं, अपने गुरुभाई, परम प्रिय अनुज, आजीवन-संस्कृत-सेवी डॉ० शिवबालक द्विवेदी, जो सम्प्रति स्नातकोत्तर महाविद्यालय, फरुखाबाद में प्राचार्य हैं, के प्रति भी अपना हार्दिक कृतज्ञताज्ञापन करती हूँ, जिन्होंने मेरे, यू०जी०सी० से स्वीकृत बृहत्शोधयोजना के कार्यान्वयन हेतु, नियमानुसार विज्ञापित किये गये साक्षात्कार के लिए 'संस्कृत विशेषज्ञ' के रूप में उपस्थित होकर सुयोग्य एवं संस्कृतनिष्ठ शोध-सहायकों की नियुक्ति करके, मेरे बृहत्शोधकार्यभार को सुकर बनाया। इसके अतिरिक्त भी अनेक बार संस्कृत अधिवेशनों में आमन्त्रित करके मुझे विनम्र सम्मान प्रदान किया है। अन्त में, मैं अपनी उन तीनों शोधसहायिकाओं- डॉ० विनोदिनी पाण्डेय, डॉ० सुषमा शर्मा तथा डॉ० लक्ष्मीदेवी शर्मा को उनके सुखी एवं सफल जीवन हेतु अपना शुभाशीर्वाद प्रदान करती हूँ, जिन्होंने ही मेरे इस बृहत्शोधकार्य के संस्कृत महायज्ञ में अपनी अपनी सश्रम कर्त्तव्यनिष्ठता की आहुतियाँ अर्पित की हैं। विशेषतः मेरी शिष्या, डॉ लक्ष्मीदेवी शर्मा द्वारा इस शोधग्रन्थ के प्रूफसंशोधन तथा संस्कृतसम्बन्धी अन्यानेक लेखनकार्य में कृतसाहाय्य के लिए मैं आभार व्यक्त करती हूँ। तत्पश्चात् मैं उन विद्वत्जनों व पाठक गणों को भी हार्दिक धन्यवाद देना अपना कर्त्तव्य समझती हूँ, जो मेरे इस अथक श्रमसाध्य बृहत्ग्रन्थ को साभिरुचि पढ़कर, मेरे श्रम को सार्थक बनाने में सहायक होंगे। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरे इन ग्रन्थ द्वारा प्रस्तुत, राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता से सम्बन्धित, वैदिक वाङ्मय का अक्षुण्ण- बहुमूल्यज्ञान, जो सार्वकालिक एवं सार्वदेशिक है, सभी देशभक्त राजनीतिज्ञों व केन्द्रस्थ नेताओं के लिए सर्वदा एवं सर्वथा हितकर सिद्ध होगा। इस बृहत्ग्रन्थ के प्रकाशन में सहायक दिल्ली निवासी स्व० के०एल० जोशी तथा उनके सुपुत्र सुप्रिय परिमल जोशी तथा 'परिमल पब्लिकेशन्स' से सम्बद्ध सभी आत्मीयजनों को मैं साधुवाद देती हूँ, जिनके नैष्ठिक योगदान से मेरा यह ग्रन्थ देश के सम्मुख उपस्थित हो सका है। बसन्त पञ्चमी, सन् २०११ अन्नपूर्णा मिश्रा CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar