वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri xvii है— कि हमारा एक संविधान, एक राष्ट्रीय ध्वज तथा एक ही राष्ट्रीय सम्मान सदैव अक्षुण्ण रहेंगे। अन्तिम दशम अध्याय के उपसंहार में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता की संरक्षा के लिए वर्तमान, आतंकवादी-विध्वंसक प्रवृत्तियों को समाप्त करने के लिए महत्त्वपूर्ण उपाय व कतिपय सुझाव भी प्रस्तुत किये गये हैं। आज भारतीय लोकतन्त्र के लिए आतङ्कवाद एक गम्भीरतम चुनौती बना हुआ है। यह देश की राष्ट्रीयएकता व अखण्डता के लिए ‘बारूद के गोले' की तरह भयावह है। फिर भी यह आतङ्कवाद केवल कानून व व्यवस्था का प्रश्न नहीं है, यह एक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य है, एक मनोवैज्ञानिक पक्ष है, जो बल प्रयोग से नहीं सुलझ सकता है। बल प्रयोग भी विवेक व सद्भावना के साथ करना चाहिए। शासन द्वारा आतङ्कवादियों से बातचीत अवश्य की जानी चाहिए। शर्त केवल यह हो कि बातचीत संविधान के दायरे में हो, तथा बातचीत हेतु आगे आने वाले आतंकवादी भविष्य में अपने आपको देश की एकता व अखण्डता के लिए प्रतिबद्ध घोषित करें तथा आतंकवाद का रास्ता छोड़ने की घोषणा करें। उक्तानुसार, भारत के वर्तमान प्रजातान्त्रिक परिवेश में वैदिक ऋषियों द्वारा प्रदत्त वैदिक-वाङ्मय में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के संरक्षित सूत्रों, का समीक्षात्मक अध्ययन कर आगामी मानवता हेतु उनकी उपादेयता प्रमाणित करना ही मेरी इस शोधयोजना का लक्ष्य रहा है। मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि मेरे शोधावधि में वैदिक वाङ्मय के ऐसे अनेक अनछुए एव उपयोगी प्रसङ्ग उभर कर सम्मुख आए हैं; जिनसे वर्तमान एवं आगामी भारतीय मानवता अपने हितों की रक्षा कर सकती है, तथा विश्वमानवता के मञ्च पर समादृत हो सकती है। मुझे आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि मेरी इस बृहत- शोधयोजना के अन्तर्गत प्रस्तुत शोधकार्य के माध्यम से न केवल बुद्धिजीवी-देशवासी प्रेरणा प्राप्त करके लाभान्वित होंगे; प्रत्युत् यह विशद् एवं बृहतशोधग्रन्थ राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता को सुरक्षित रखने में भी महान् उपयोगी सिद्ध होगा। और, अब मैं सर्वप्रथम, अपने पितृ-तुल्य गुरु स्वर्गीय डॉ० हरिदत्त शास्त्री को अपनी भावाञ्जलि अर्पित करते हुए उन्हें हृदय से नमन करना चाहूँगी, जिनसे प्राप्त सुशिष्यत्व, शोधनिर्देशन, मार्गदर्शन तथा पितृ-तुल्य स्नेहिल आशीर्वादों के कारण ही मैं विगत पञ्चाशताधिक वर्षों से सुरभारती संस्कृत की सतत् सात्विक-अनेकविध- सेवाओं द्वारा आज इस गन्तव्य तक पहुँच सकी हूँ। मैंने न केवल अनेक छात्र- छात्राओं का निःस्वार्थ संस्कृत-शोधनिर्देशन करके उन्हें सुयोग्य बनाया, प्रत्युत् महाविद्यालयीय-सत्यनिष्ठ-प्राचार्यत्व के साथ ही साथ, विश्व-संस्कृत-परिषद् तथा CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar