वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम खण्ड – परिप्रेक्ष्य प्रथम अध्याय राष्ट्र की संकल्पना राष्ट्र का स्वरूप एवम् प्रकृति वैदिक काल में 'राष्ट्र' शब्द देश या राज्य के लिए प्रयुक्त किया जाता था।¹ ऋग्वेद में स्वराज्य का उल्लेख भी मिलता है। राष्ट्र शब्द की उत्पत्ति राज् धातु से ष्ट्रन प्रत्यय के योग से हुई है, जिसका सामान्य अर्थ है— राज्य, देश, साम्राज्य। राष्ट्र शब्द बहुत ही व्यापक अर्थ रखता है, इसमें निश्चित भू-भाग पर निवास करने वाली समस्त प्रजा की भावनाओं और विचारों की प्रतीक संस्कृति और सभ्यता सम्मिलित होती है। किसी देश की सभी इकाईयों की समष्टि ही राष्ट्र का वास्तविक स्वरूप है किन्तु राष्ट्र के स्वरूप को स्पष्ट करने हेतु कुछ व्यापक तथा अनिवार्य तत्त्व भी होते हैं, जिसमें धर्म, संस्कृति, भाषा, जनता, राजनैतिक विचार आदि प्रमुख हैं। राष्ट्र का प्राकृतिक स्वरूप भी उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है जितना सामाजिक। विश्व के प्राचीनतम साहित्यों में राष्ट्र या देश के प्रति सुन्दर उद्गारों की अभिव्यक्ति की झलक यत्र-तत्र स्पष्ट दिखाई पड़ती है। राष्ट्र शब्द एक सुनिर्दिष्ट अर्थ और भावना का प्रतीक है जिस प्रकार यजुर्वेद में राष्ट्र के कल्याण की कामना कितने सुन्दर शब्दों में की गयी है— आ राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम्।² अर्थात् हमारे राष्ट्र में क्षत्रिय, वीर, धनुर्धारी, लक्ष्यवेधी और महारथी हो। अभिवर्धताम् पयसाभि राष्ट्रेण वर्धताम्।³ अथर्ववेद में भी 'राष्ट्र' के धन-धान्य, दुग्धादि से संवर्धन प्राप्ति की कामना की गयी है :— 'राष्ट्र' से सम्बन्धित शब्दों का प्रयोग वैदिक साहित्य में अत्यधिक किया गया
- ऋग्वेद मण्डल १०, सूक्त, २७३, ऋचा ५ और म० ४, सू० ४२, ऋ० १ तथा मं० ५, सू० ६६, ऋ० ६।
- यजुर्वेद - अध्याय २८/२२
- अथर्ववेद - अध्याय ६/७८/२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar