भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 353 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 30

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 2 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता है। जैसे साम्राज्य, स्वराज्य, राज्य, महाराज्य आदि। इन सबमें 'राष्ट्र' शब्द ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। 'राष्ट्र' शब्द से आशय उस भूखंड विशेष से है जहाँ के निवासी एक संस्कृति विशेष में आबद्ध होते हैं। एक सुसमृद्ध राष्ट्र के लिए उसका स्वरूप निश्चित होना आवश्यक है। कोई भी देश एक राष्ट्र तभी हो सकता है जब उसमें देशेतरवासियों को भी आत्मसात् करने की शक्ति हो। उनकी अपनी जनसंख्या, भू-भाग, प्रभुसत्ता, सभ्यता, संस्कृति, भाषा, साहित्य, स्वाधीनता और स्वतन्त्रता तथा राष्ट्रीय एकता आदि समस्त तत्त्व हों, जिसकी समस्त प्रजा अपने राष्ट्र के प्रति आस्थावान हो। वह चाहे किसी भी धर्म, जाति तथा प्रान्त का हो। प्रान्तीयता और धर्म संकुचित होते हुए भी राष्ट्र की उन्नति में बाधक नहीं होते हैं क्योंकि राष्ट्रीय एकता 'राष्ट्र' का महत्त्वपूर्ण आधारतत्त्व है, जो नागरिकों में प्रेम, सहयोग, धर्मनिष्ठा, कर्त्तव्यपरायणता, सहिष्णुता तथा बन्धुत्व आदि गुणों का विकास करता है तथा धर्म तथा प्रान्तीयता गौण हो जाती है। तब राष्ट्र ही सर्वोपरि होता है। इन गुणों के विकास से ही राष्ट्र स्वस्थ तथा शक्तिशाली होता है। राष्ट्र नागरिकों पर अनिवार्य रूप से कर लगाता है जिसे राष्ट्र की व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित कर सके। इस प्रकार 'राष्ट्र' प्रभुत्त्व-सम्पन्न स्वाधीन तथा स्वतन्त्र संगठन है जिसका स्वरूप आध्यात्मिक भावना तथा राष्ट्रीय एकता पर निर्भर रहता है, जो अमूर्त होता है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है। राष्ट्र का प्राकृतिक स्वरूप भी उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है जितना सामाजिक। राष्ट्र को सुसम्पन्न तथा गौरवपूर्ण होने के लिए उसकी प्राकृतिक-सम्पदाएँ भी अपनी पूर्णता को प्राप्त होनी चाहिए, जिससे राष्ट्र निवासी अपना भरण-पोषण स्वयं कर सकें तथा अपने राष्ट्र पर बोझ न बनने पाएँ। जिस प्रकार पर्वतराज हिमालय हमारे राष्ट्र की प्राकृतिक सम्पदा है, जिस पर सैकड़ों ऋषि-मुनि निरन्तर साधना करते रहते हैं और उस पर उगने वाली असंख्य जड़ी-बूटियाँ भयानक से भयानक रोगों को दूर करने में सक्षम हैं। जो उत्तर दिशा में मुकुट के समान देदीप्यमान है। महाकवि कालिदास ने हिमालय का वर्णन कितने सुन्दर शब्दों में किया है- अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः। पूर्वापरौ तोय निधीवगाह्य- स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः॥१ १. महाकवि कालिदास CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar