वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 3 ब्रह्मपुत्र, गंगा, यमुना, सिन्धु आदि महानदियाँ इसी हिमालय से निकलती हैं जो भारत-भू को हरा-भरा तथा उपजाऊ बनाती हैं। इसकी प्राकृतिक शोभा अनुपम है जिसका वर्णन करते हुए सैकड़ों महाकवियों ने प्रकृति-परक रचनाएँ लिखी हैं। स्वराष्ट्र भारत का मौसम भी सर्वानुकूल है। यहाँ पर वर्ष भर में छः ऋतुएँ आती हैं। जिनका क्रम बहुत ही सुन्दर है तथा प्राणियों के स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यन्त उपयुक्त है। सर्वप्रमुख वसन्त ऋतु है जिसमें चित्र-विचित्र रंगों वाले सुगन्धित पुष्प खिल जाते हैं, कोयल पंचम स्वर में गाने लगती है। यह वसन्त ऋतु अन्य किसी देश में नहीं होती। इस वसन्त ऋतु में समस्त विशेषताओं को एकत्र देखकर ही भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में वसन्त को अपना स्वरूप बताया है— बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्। मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥१ इसी प्रकार महाकवि कालिदास ने अपने ऋतु संहार में वसन्त ऋतु का कितना सटीक वर्णन किया है जिसका एक अनुपम उदाहरण यह है— द्रुमा सपुष्पाः सलिलं सपद्मम् स्त्रियः सकामाः पवनः सुगन्धिः। सुखा प्रदोषा दिवसाश्च रम्याः सर्वप्रिये चारुतरं बसन्ते॥२ अर्थात् वसन्त ऋतु में वृक्ष पुष्पों से युक्त हो जाते हैं, जल में कमल खिल जाते हैं, स्त्रियाँ कामभाव से युक्त हो जाती हैं तथा पवन सुगन्धित हो जाता है। सन्ध्या काल सुखदायक तथा दिन रमणीय हो जाते हैं। इस प्रकार प्रिय वसन्त ऋतु में सब कुछ चारुतर हो जाता है। यहाँ का साहित्य, दर्शन, ज्योतिष, आयुर्वेदादि संसार के प्राचीनतम साहित्य, दर्शन तथा विज्ञान है जो पाठक के हृदय में ऐसी भावनाओं को उद्वेलित करता है जो राष्ट्रीय एकता तथा विश्व-बन्धुत्व की भावना से ओत-प्रोत हो। अधोलिखित उदाहरण भारत की विश्व बन्धुत्व की भावना का सार्थक उदाहरण है— विश्वबन्धुत्वमुद्घोषयत्पावनं विश्ववन्द्यैश्चरित्रैर्जगत्पावयत्। १. श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १०/३५ २. महाकवि कालिदास का ऋतुसंहार। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar