भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 4 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता विश्वमेकं कुटुम्बं समालोकयद् भूतले भाति मेऽनारतं भारतम्॥१ अर्थात् पवित्र विश्वबन्धुत्व-भावना की उद्घोषणा करने वाला, विश्ववन्द्य चरित्रों से जगत् को पवित्र करने वाला और सम्पूर्ण विश्व को एक कुटुम्ब के रूप में देखने वाला मेरा भारत भूतल पर सदा प्रोद्भासित रहता है। इस प्रकार भारत में जनसंख्या, भौगोलिकता, प्रभुसत्ता, सभ्यता, संस्कृति, भाषा, साहित्य, स्वाधीनता और स्वतन्त्रता आदि समस्त तत्त्व हैं जो किसी भी राष्ट्र की आन्तरिक शक्ति होते हैं और यही आन्तरिक शक्ति राष्ट्रीय एकता का आधार है जो राष्ट्र का प्राणतत्त्व होती है। अतः राष्ट्र के प्रति विशिष्ट आत्मीयता व गौरव की भावना से युक्त व्यक्तियों का समुदाय ही राष्ट्र कहलाता है जिसका सार्थक उदाहरण है- भारत। राष्ट्र की विषयवस्तु एवं क्षेत्र राष्ट्र की रचना के लिए जनसमूह अर्थात् जनसंख्या का होना अति-आवश्यक है। जनसमूह के पश्चात् उसमें एकता, सहायता और सहयोग की भावना राष्ट्र का प्राणतत्त्व है क्योंकि एक राष्ट्र के संगठन के लिए सदस्यों में एकता, सहायता तथा सहयोग की भावना अति आवश्यक है, उसके अभाव में राष्ट्र का संगठन ही असम्भव है। रेम्जेम्यूर ने राष्ट्र के स्वरूप को कुछ इस प्रकार परिभाषित किया है— "अस्थायी तौर पर हम कह सकते है कि राष्ट्र वह जन-समुदाय है जिसके सदस्य अपने को स्वाभाविक रूप से एकता के कुछ ऐसे सूत्रों में बँधा हुआ अनुभव करते हैं जो इतने दृढ़ और वास्तविक होते हैं कि उनके कारण वे प्रसन्नतापूर्वक साथ-साथ रह सकते हैं, पृथक् हो जाने पर दुःखी होते हैं और ऐसे लोगों की अधीनता सहन नहीं कर सकते जो उन बन्धनों के अन्तर्गत नहीं है।''२ उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि राष्ट्र के संगठन हेतु किन्हीं निश्चित तत्त्वों की आवश्यकता नहीं। समान जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति, भूभाग की अपेक्षा उनमें साथ-साथ रहने की इच्छा तथा एकता की भावना होना अति आवश्यक है। अतः 'राष्ट्र' एक कल्पना है जिस कल्पना का आधार होता है— मानवीय एकता। 'राष्ट्र' वह भावना है जो एकत्व की ओर प्रेरित करती है। राष्ट्र के लिए जनसंख्या, भू-भाग, सरकार, प्रभुसत्ता आवश्यक नहीं, उसके लिए आवश्यक है मिट्टी से प्यार। १. भातिमे भारतम् – शुक्ल, रमाकान्त। २. आधुनिक राजनीतिक विचारधाराएँ, लेखक सत्यनारायण दुबे, पृ० ३३१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar