वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 5 "जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं। वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।''१ आध्यात्मिक संगठन ही राष्ट्र का स्वरूप राष्ट्रीय भावनाओं का सम्बन्ध मुख्यतः मनोवैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक तथ्यों से है। राष्ट्रीयता की भावना को जगाने वाले मूल तत्त्व आवश्यक रूप से अमूर्त होते हैं। गिलक्राइस्ट ने भी राष्ट्र के प्राणतत्व राष्ट्रीयता को एक भाव ही माना है। गिलक्राइस्ट के अनुसार— "राष्ट्रीयता एक भावना है, जिसकी उत्पत्ति उन लोगों में होती है, जो साधारणतः एक जाति के होते हैं, जो एक भू-भाग पर रहते हैं, जिनकी एक भाषा, एक धर्म, एक साहित्य, एक-सी परम्पराएँ एवं समान हित होते हैं तथा जिनके एक से राजनीतिक समुदाय तथा राजनीतिक एकता के समान आदर्श तथा आंकाक्षाएँ होती हैं, जिन पर राष्ट्रीयता आधारित होती है। यह सब राष्ट्रीयता के आधार हैं, स्वयं राष्ट्रीयता नहीं। राष्ट्र भावनात्मक शक्ति पर निर्भर राष्ट्र की शक्ति आन्तरिक रूप से भावनात्मक होती है जिसका सम्बन्ध नैतिकता से है। इस प्रकार राष्ट्र की मूल शक्ति नैतिकता ही है। राष्ट्र जब सदस्यों से कोई कार्य करवाना चाहता है तब वह ऐसे वातावरण का निर्माण करता है जिससे लोगों के मन में स्वतः ही उस कार्य को करने की भावना उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार वह प्रार्थना करता है परन्तु आज्ञा नहीं देता। अतः राष्ट्र की शक्ति प्रजा की स्वैच्छिक नैतिक शक्ति है। राष्ट्र निर्माणक तत्त्व अनिश्चित राष्ट्र को निर्मित करने के लिए कोई निश्चित तत्त्व नहीं है क्योंकि उनमें सदैव समयानुसार परिवर्तन होता रहता है। जिस प्रकार राज्य के चार निर्माणक तत्त्व निश्चित है— जनसंख्या, भू-भाग, सरकार और प्रभुसत्ता। जहाँ ये चारों संयुक्त हो जाते हैं वहीं राज्य का निर्माण हो जाता है। वैसे राष्ट्र के कोई निश्चित निर्माणक तत्त्व नहीं है। इस प्रकार राष्ट्र के मूलतः कोई निश्चित तत्त्व नहीं है क्योंकि राष्ट्र का स्वरूप अमूर्त होता है जिसकी संरचना को अनुभव के आधार पर समझा जा सकता है, देखा नहीं जा सकता। राष्ट्र के निर्माणक तत्त्व राष्ट्र के निर्माणक तत्त्व मुख्यतः अनिश्चित है, तत्त्वों की अनिश्चितता होते हुए भी राष्ट्र के निर्माण हेतु अधोलिखित तत्त्वों की आवश्यकता पड़ती है। १. राष्ट्रकवि मैथिलीशरणगुप्त की कविता से उद्धृत। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar