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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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6 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता १. जनसंख्या २. भौगोलिकता ३. भाषा ४. धर्म ५. शासन व्यवस्था ६. सभ्यता और संस्कृति ७. साहित्य ८. राष्ट्रीय एकता और कल्याणकारी भावना ९. स्वाधीनता और स्वतन्त्रता १. जनसंख्या जनसंख्या राष्ट्र का मुख्य तत्त्व है। जब तक राष्ट्र में पर्याप्त जनसंख्या नहीं होगी तब तक राष्ट्र को संगठित नहीं किया जा सकता क्योंकि राष्ट्र का प्राणतत्त्व है— राष्ट्रीय भावना, जो कि लोगों के परस्पर मिलजुल कर एक साथ रहने से तथा विचारों के आदान-प्रदान, प्रेम सहयोग की भावना, सभ्यता और संस्कृति आदि के द्वारा पल्लवित तथा पुष्पित होती है। यह तभी सम्भव है जब जनसंख्या का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता, शान्तिमय जीवन तथा जीओ तथा जीने दो की भावना से ओत-प्रोत हो। अतः राष्ट्र की उन्नति हेतु यह भी आवश्यक है। राष्ट्र की जनसंख्या न तो इतनी कम हो कि शासन-व्यवस्था सुचारू रूप से कार्य न कर सके और न ही इतनी अधिक कि राष्ट्र पर बोझ बन जाये अर्थात् उसे पराश्रयी होना पड़े। २. भौगोलिकता राष्ट्र की आध्यात्मिकता की भावना को दृढ़ता प्रदान करने में भौगोलिकता का अपना विशेष महत्त्व है क्योंकि भौगोलिकता ही मनुष्य को एकत्व की शिक्षा प्रदान करती है। एक भू-भाग पर बसा हुआ जन-समूह स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय एकता के दृढ़-बन्धन में बँध जाता है क्योंकि उसकी समान जाति, भाषा, धर्म, परम्परा, सभ्यता, संस्कृति, साहित्य, आचार-विचार तथा भाव आदि समान होने के कारण उनसे प्रेरित होकर ही वह दूसरे के दुःख में अपना दुःख तथा दूसरों के सुख में अपना सुख समझता है। यही प्रेम, परस्पर सहयोग की भावना ही उसे राष्ट्रीयता से जोड़ती है जो निश्चित भू-भाग पर रहने के लिए बाध्य करती है तथा राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता रूपी निधि को सुरक्षा प्रदान करती है।

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar