भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 353 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 35

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 7 ३. भाषा प्रत्येक राष्ट्र के संगठन हेतु भाषा का होना अति आवश्यक है क्योंकि भाषा रहित राष्ट्र गूँगे व्यक्ति के समान होता है जिसकी अपनी कोई भाषा, शैली, भाव तथा विचार नहीं होते। अतः राष्ट्र को सुसंगठित करने हेतु राष्ट्र की एक राष्ट्रीय भाषा होनी चाहिए जो सम्पूर्ण राष्ट्र में बोली जाए तथा जिसके माध्यम से ही राष्ट्रीय स्तर पर समस्त कार्य किये जाएँ तथा राष्ट्र अपनी शासन-व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित कर सके। भाषा ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा ही हम अपने भावों, विचारों तथा अनुभवों को व्यक्त कर सकते हैं तथा दूसरों के भावों, विचारों तथा अनुभवों को समझ सकते हैं। भाषा के माध्यम से ही मानव जाति ने न केवल समाज के रूप में अपितु, राष्ट्र रूप में स्वयं को गुम्फित कर लिया है। इस प्रकार राष्ट्र संगठन तथा राष्ट्रीयता को दृढ़ता प्रदान करने में भाषा अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ४. धर्म मनुष्य स्वेच्छा से जो कुछ धारण करता है वही धर्म है और धर्म का राष्ट्र के संगठन में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि धर्म ही मनुष्य को मानवता से जोड़ता है और मानवता मनुष्यता से। जब मनुष्य के मन में सुखी जीवों को अधिक सुखी और दुःखी जीवों को सुखी बनाने का भाव जाग्रत होता है, तब उसके द्वारा किये गये प्रत्येक कल्याणकारी कार्य उसका धर्म होते हैं। यही धर्म उसे राष्ट्र की भावनात्मक शक्ति राष्ट्रीयता से जोड़ता है जो राष्ट्र को सुसंगठित करता है। ५. शासन-व्यवस्था सुसंगठित राष्ट्र के संचालन हेतु शासन-व्यवस्था की आवश्यकता होती है जिसके अभाव में राष्ट्र में अराजकता, वैमनस्य आदि व्याप्त हो जाते हैं जिससे सब अपनी मनमानी करने लगते हैं। "जिसकी लाठी उसकी भैंस" वाली कहावत चरितार्थ होने लगती है। अतः समस्त मानव जाति तथा राष्ट्र उन्नति के मूल उद्देश्य की पूर्ति हेतु ही शासन-व्यवस्था की महती आवश्यकता पड़ती है, जिससे राष्ट्र का गौरव तथा उसकी स्वतन्त्रता सदैव बनी रहती है। शासन व्यवस्था से तात्पर्य यहाँ केवल राजनैतिक व्यवस्था से ही नहीं है, अपितु सामाजिक, आर्थिक, नैतिक आदि उसमें सभी सम्मिलित हैं। इस प्रकार सरकार शासन-व्यवस्था को संचालित करने का माध्यम है और जिसका संचालक है राष्ट्र। ६. सभ्यता और संस्कृति सभ्यता और संस्कृति राष्ट्र गठन में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। किसी CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar