वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 8 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता भी राष्ट्र की पहचान उसकी सभ्यता तथा संस्कृति ही होती है जिसके द्वारा ही वह अन्य राष्ट्रों के समक्ष अपनी पहचान बनाये रखता है। सभ्यता और संस्कृति ही मनुष्य को आध्यात्मिक तथा मनोवैज्ञानिक तथ्यों से सम्बद्ध करती है और राष्ट्रीयता की भावना को साकार करती है। सभ्यता और संस्कृति के माध्यम से ही मानव-समाज विचारों की संकीर्णता को त्यागकर विस्तृतता को प्राप्त होता है जिससे मानव का स्वयं का, समाज का तथा राष्ट्र का कल्याण होता है। इस प्रकार संस्कृति ही धार्मिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक तथा विश्वबन्धुत्व की भावना को प्रवाहित करने वाली नदी है जिसका उद्गम स्थान है- राष्ट्र। ७. साहित्य साहित्य भी राष्ट्र संगठन को अत्यधिक प्रभावित करता है। साहित्य के द्वारा ही व्यक्ति स्वयं को समाज में समायोजित करने योग्य बनाता है। समाज में समायोजित व्यक्ति ही अपना, अपने परिवार का, नगर का, देश तथा समाज का कल्याण कर सकता है। इस प्रकार साहित्य व्यक्ति पर, समाज पर तथा राष्ट्र पर अपना विशेष प्रभाव डालता है जिससे राष्ट्र की आन्तरिक भावनात्मक शक्ति को तथा राष्ट्रीय एकता को बल मिलता है। साहित्य के माध्यम से ही व्यक्ति अपनी सभ्यता, संस्कृति, धर्म, भाषा, आचार-विचार आदि से स्वयं की पहचान बनाते हैं और सभ्यता, संस्कृति, धर्म, भाषा आदि से जोड़कर स्वयं को तथा राष्ट्र को गौरवान्वित करते हैं। राष्ट्रीय एकता और कल्याणकारी भावना राष्ट्रीय एकता राष्ट्र का प्राणतत्त्व है जिसके अभाव में राष्ट्र का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। राष्ट्रीय एकता मूलतः वह भावना है जो प्रत्येक जन के हृदय में विद्यमान रहती है, जिससे प्रेरित होकर ही वह एकता के सूत्र में बँध जाते हैं और राष्ट्र के उत्थान हेतु सदैव तत्पर रहते हैं। जे०एच० रोज़ के शब्दों में— "राष्ट्रीयता हृदयों की वह एकता है जो एक बार बनकर कभी नहीं बिगड़ती।"१ उपरोक्त परिभाषा से स्पष्ट ही है जब प्रत्येक जन हृदय से एकता के सूत्र में बँध जाता है, तो वह मन, वचन, कर्म से स्वतः ही एकता के अटूट बन्धन में बँध जायेगा, तब उसका प्रत्येक कार्य बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय तथा निःस्वार्थ भाव लिये अवश्य ही कल्याणकारी होगा, जिससे सम्पूर्ण राष्ट्र सुगन्धित हो उठेगा। जिसका प्रत्येक जनरूपी विकसित पुष्प प्रफुल्लित हो, वह राष्ट्ररूपी उपवन को ही सर्वोपरि समझेगा और अपने उपवन की सुगन्ध को किसी को चुराने नहीं देगा। १. नागरिक शास्त्र के सिद्धान्त, पृ० सं० ४०६ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar