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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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प्रथम अध्याय 9 इस प्रकार राष्ट्रीय एकता और कल्याणकारी भावना राष्ट्र रूपी आत्मा के दो अलग-अलग नाम हैं जिनके अभाव में राष्ट्र संगठन कदापि सम्भव नहीं। स्वाधीनता और स्वतन्त्रता स्वाधीनता और स्वतन्त्रता ही प्रत्येक राष्ट्र को अन्य राष्ट्रों से भिन्न करती है। जब तक राष्ट्र स्वाधीन और स्वतन्त्र नहीं होगा तब तक वह राष्ट्र ही नहीं कहला सकता। राष्ट्रीय स्वाधीनता और स्वतन्त्रता से तात्पर्य है— राष्ट्र का आत्मनिर्भर होना अर्थात् अपने आन्तरिक, बाह्य कार्य में पूर्ण स्वतन्त्र तथा शासन-व्यवस्था में किसी अन्य राष्ट्र का हस्तक्षेप न होना, स्वतन्त्रता जिसकी परिचायक है। स्वाधीनता और स्वतन्त्रता राष्ट्र निधि के ऐसे बहुमूल्य रत्न है जो नागरिकों में प्रेम, सहयोग, अनुशासन, धर्म, निष्ठा, कर्तव्यपरायणता, सहिष्णुता तथा बन्धुत्व आदि गुणों को विकसित कर राष्ट्र को स्वस्थ और शक्तिशाली बनाते हैं। स्वाधीनता और स्वतन्त्रता के अभाव में राष्ट्र की स्थिति एक दास के समान होती है जिसकी अपनी कोई इच्छा नहीं होती। इस प्रकार राष्ट्र के संगठन में स्वाधीनता और स्वतन्त्रता का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस प्रकार राष्ट्र का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत तथा व्यापक है जो मुख्यतः अपने नागरिकों की बाह्य आक्रमणों से रक्षा करता है तथा उनके आत्मिक, मानसिक तथा शारीरिक विकास हेतु अवसर प्रदान करता है। विधि, सुरक्षा विभाग तथा न्यायालयों के द्वारा सम्पूर्ण राष्ट्र में शासन-व्यवस्था बनाये रखता है क्योंकि देश में व्याप्त अशान्ति ही राष्ट्र उन्नति में बाधक होती है और सुरक्षा उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है। राष्ट्र द्वारा प्रदत्त सुरक्षा ही नागरिकों का नैतिक एवं मानसिक स्तर ऊँचा उठाती है तथा उन्हें सभ्यता और संस्कृति की ओर उन्मुख करती है। राष्ट्र ही प्रत्येक नागरिक के अधिकार और कर्तव्य निश्चित करता है और अधिकार मनुष्य को वास्तविक रूप प्रदान करते हैं। राष्ट्र किसी भी नगर तथा प्रान्त को असामयिक, प्राकृतिक प्रकोप के आ जाने पर प्रत्येक दृष्टि से सहायता प्रदान करने हेतु सदैव तत्पर रहता है। सार्वजनिक वाचनालय, पुस्तकालय, चित्रशाला, पार्क, चलचित्र, प्रदर्शनी, मेले आदि साधनों के द्वारा राष्ट्र समस्त जनता का मनोरंजन कराता है जो मनोरंजन के साथ-साथ प्रेम-सौहार्द की भावना को विकसित करते हैं। राष्ट्र व्यापार, सहयोग के लिए दूसरे राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करता है जिससे विश्व-बन्धुत्व की भावना पल्लवित तथा पुष्पित होती है। इस प्रकार राष्ट्र का उद्देश्य होता है अपनी सभ्यता एवं संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना तथा समस्त देशवासियों को शिक्षित कर उनका सर्वतोमुखी विकास करना।

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar