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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 343

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दशम अध्याय 315

भावना को पनपने की पृष्ठभूमि तैयार करता है। बेरोजगारों को रुपये के लालच में आसानी से बरगलाया जा सकता हैं, उन्हें भटकते हुए देर नहीं लगती हैं। अतः शिक्षा को रोजगार से जोड़ा जाय और प्रतिवर्ष करोड़ों व्यक्तियों के लिए रोजगार जुटाये जायें। आर्थिक असमानता को समाप्त तो नहीं किया जा सकता, लेकिन उसे नियंत्रित करना होगा और आर्थिक-सामाजिक न्याय की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे। (ज) शासन की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करना :- पिछले लगभग २५ वर्षों में शासन, चाहे वह केन्द्रीय शासन हो या राज्य शासन, की प्रतिष्ठा का बहुत अधिक क्षय हुआ है। अतः शासन की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करना होगा और इस सम्बन्ध में कुछ सुझाव हैं :- प्रथम, भारतीय संविधान के निर्माताओं ने भारत में 'सहयोगी- संघवाद' की कल्पना की थी और आज इस 'सहयोगी-संघवाद' की नितान्त आवश्यकता अनुभव की जा रही है। इसमें राज्य व केन्द्र की सरकारें एक दूसरे की कठिनाइयों को समझें और एक दूसरे के साथ सहयोग करें। द्वितीय आज स्थिति यह है कि आतंकवादी तत्त्व केन्द्र सरकार पर भी दबाव डालने की कोशिश करते हैं और इसमें कई बार वे सफल भी हो जाते हैं। अधिक स्पष्ट रूप से यह स्थिति 'रूबैया प्रकरण' (१९८९) से सामने आई है। ऐसी घटनाएँ आतंकवादी तत्त्वों को बढ़ावा देने वाली होती हैं। किसी भी स्थिति में शासन को इन ताकतों के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए। राष्ट्रहित व्यक्तिगत हित से कहीं ऊँचा होता है। आवश्यकता अनुभव होने पर आतंकवाद के विरुद्ध भारी बल प्रयोग करना भी उचित है। इससे शासन की दृढ़बद्धता का प्रमाण मिलता है। दृढ़-प्रतिज्ञ शासन ही सभी प्रकार के आतंकवाद से निपट सकता है। (झ) पाकिस्तान के अनुचित हस्तक्षेप पर प्रतिबन्ध :- आतंकवाद का एक अति प्रमुख कारण पड़ोसी राज्य पाकिस्तान द्वारा भारत में आतंकवादियों को दिया जाने वाला भारी प्रोत्साहन है। सीमाओं के रास्ते से देश में प्रशिक्षित आतंकवादियों को अनाधिकार प्रविष्ट कराने की घटनायें, हमारे ही देश के कितने युवाओं का अपहरण कर उन्हें आतंकवाद के लिए बाध्य करना, यह सब आम बात हो गई है। इसके लिए सर्वप्रथम, तो पाकिस्तान से जुड़ी हुई सभी सीमाओं को सील कर देना चाहिए, तभी यह प्रवेश रोका जा सकता है। द्वितीय, हमें अपने इस पड़ोसी देश को समझाना होगा कि भारतीय मामलों में दखलंदाजी उसके लिए भयानक परिणामों को जन्म देगी। मैत्री के स्वर में कही गई बात को यदि पड़ोसी देश उचित महत्त्व नहीं देता है तो चेतावनी देनी होगी और नितान्त आवश्यक हो जाने पर उसे 'शक्ति की भाषा' में भी समझना होगा। इस प्रसंग में हमें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद को प्रोत्साहित करने

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar