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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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प्रथम अध्याय 11 पुत्र हूँ— राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्त्तव्य है कि वह राष्ट्र के सच्चे अभ्युदय में यथाशक्ति योग दे।१ उपर्युक्त विचार से स्पष्ट है कि राष्ट्र का हित ही अपना हित है। इस भावना से ओत-प्रोत होकर प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र के अभ्युदय में अपना यथाशक्ति योग दे। डा० सिन्हा ने राष्ट्र की उत्पत्ति किस प्रकार होती है तथा राष्ट्र के उत्पत्तिकाल को अपने शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास किया है। डा० सिन्हा के अनुसार— “जब आर्यजन (कबीले) निश्चित भू-भाग पर रहने लगे तो उन्हें उस भूमि से अवश्य ही प्रेम उत्पन्न हुआ होगा, उस प्रेम के साथ उनमें आदिवासियों के प्रति घृणा और अपने वर्ण (रंग) तथा विजित प्रदेश के रक्षण के लिए गहरी चिन्ता उत्पन्न हुई होगी। इस प्रकार आर्यों के मन में उसी भूमि के प्रति, जहाँ के वे निवासी थे, एक सुदृढ़ भावना पैदा हुई होगी क्योंकि उस भूमि से वह कभी हटना नहीं चाह सकते थे। इस भावना ने, जिसे प्रतिरक्षा व आक्रमण की आवश्यकता ने अधिक सुदृढ़ बनाया होगा, प्रारम्भिक राजनीतिक चेतना का रूप धारण किया होगा और इस प्रकार प्रथम राज्य, जिसे वैदिक आर्यों ने राष्ट्र कहा, उत्पन्न हुआ होगा।”२ डा० सुधीन्द्र के शब्दों में- भूमि, भूमिवासी जन और जन संस्कृति का समुच्चय 'राष्ट्र' है और 'राष्ट्र' के उत्थान और प्रगति के संयोजक तत्त्वों का समीकरण- राष्ट्र धर्म है।३ डा० सुधीन्द्र महोदय भूमि, उस पर निवास करने वाले समस्त जनसमूह तथा संस्कृति के समुच्चय को ही राष्ट्र मानते हैं तथा राष्ट्रधर्म को राष्ट्र की उन्नति का सर्वोत्तम कारण। प्रोफेसर बर्गेस के अनुसार— राष्ट्र जातीय एकता के सूत्र में बँधी हुई वह जनता है जो किसी अखण्ड भौगोलिक प्रदेश पर निवास करती हो।४ उपर्युक्त परिभाषा में जातीय आधार को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान किया है। जातीय एकता से अभिप्राय केवल जाति विशेष से नहीं हैं अपितु ऐसे समस्त समान जन समूह से है जिसकी भाषा, साहित्य, परम्परा, इतिहास तथा रीतिरिवाज आदि सभी समान हो। ब्राइस ने 'राष्ट्र' को इस प्रकार परिभाषित किया है। राष्ट्र वह राष्ट्रीयता है जिसने १. परमात्मा शरण की प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार एवं संस्थायें, पृ० ५३५ २. H.N.Sinha : The Development of Indian Polity, P. 23. ३. डा० सुधीन्द्र— हिन्दी कविता में युगान्तर, पृ० ३६. ४. आर०सी० अग्रवाल की भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन एवं संवैधानिक विकास, पृ० सं० २

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar