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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 12 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अपने आप को स्वतन्त्र अथवा स्वतन्त्रता होने की इच्छा रखने वाली राजनीतिक संस्था के रूप में संगठित कर लिया हो।१ ब्राइस की इस परिभाषा से यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्र एक राजनीतिक संस्था के रूप में संगठित स्वतन्त्र एवं स्वतन्त्रता की इच्छा रखने वाला जन-समूह है। उनकी परिभाषा से सिद्ध होता है कि उन्होंने स्वतन्त्रता को अत्यधिक महत्त्व दिया है। गिलक्राइस्ट के अनुसार- राष्ट्र अर्थ की दृष्टि से राज्य के बहुत समीप है। वे कहते है कि राष्ट्रीयता तथा राज्य को मिलाकर राष्ट्र बन जाता है।२ गिलक्राइस्ट जी राष्ट्र को राज्य के अत्यन्त समीप बताते है तथा एक-दूसरे को एक-दूसरे का पूरक मानते है। उनके अनुसार किसी एक के अथवा राष्ट्रीयता और राज्य के अभाव में राष्ट्र का निर्माण नहीं किया जा सकता। अतः राष्ट्र के लिए राष्ट्रीयता तथा राज्य दोनों का होना महती आवश्यक है। हैज के अनुसार- राष्ट्रीयता, राजनीतिक एकता तथा सत्ताधारी स्वतन्त्रता को प्राप्त करके राष्ट्र बन जाता है।३ श्री हैज के इन शब्दों का अभिप्राय यह है कि राष्ट्रीयता, राजनीतिक एकता तथा सत्ताधारी स्वतन्त्रता के अभाव में राष्ट्र के स्वरूप की कल्पना नहीं की जा सकती है। रैम्जेभ्योर के अनुसार- राष्ट्र एक ऐसा समूह होता है जिसके सदस्य स्वभावतः आपस में कई प्रकार की समानताओं से बँधे होते हैं। ये समानताएँ इतनी सुदृढ़ और वास्तविक होती है कि वे प्रसन्नता के साथ रह सकते हैं और यदि उन्हें अलग-अलग कर दिया जाये, तो वे असन्तुष्ट रहेंगे, साथ ही ऐसे व्यक्तियों के अधीन रहना नहीं चाहते, जो कि उस जन समूह से उन समानताओं द्वारा न बँधे हुए हो।४ उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि राष्ट्र ऐसे व्यक्तियों का समूह होता है जो स्वभाव से अर्थात् अन्तर्मन से ऐसे बन्धन में बँधे होते हैं जिसे देखा नहीं जा सकता अर्थात् अनुभव किया जा सकता है। वहीं बन्धन उनकी एकता अर्थात् राष्ट्रीयता कहलाता है और जिसके अभाव में वह डाल से टूटे हुए मुरझे हुए पुष्प के समान स्वयं को अनुभव करते हैं। डा० गार्नर के शब्दों में- राष्ट्र पारस्परिक समानता रखने वाले व्यक्तियों का १. आर०सी० अग्रवाल की भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन एवं संवैधानिक विकास, पृ० सं. ३ २. आर०सी० अग्रवाल की राष्ट्रीय आन्दोलन एवं संवैधानिक विकास, पृ० ३ ३. उपर्युक्त पृ० सं. ३ ४. आर०सी० अग्रवाल की राष्ट्रीय आन्दोलन एवं संवैधानिक विकास, पृ० ३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar