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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 12 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अपने आप को स्वतन्त्र अथवा स्वतन्त्रता होने की इच्छा रखने वाली राजनीतिक संस्था के रूप में संगठित कर लिया हो।१ ब्राइस की इस परिभाषा से यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्र एक राजनीतिक संस्था के रूप में संगठित स्वतन्त्र एवं स्वतन्त्रता की इच्छा रखने वाला जन-समूह है। उनकी परिभाषा से सिद्ध होता है कि उन्होंने स्वतन्त्रता को अत्यधिक महत्त्व दिया है। गिलक्राइस्ट के अनुसार- राष्ट्र अर्थ की दृष्टि से राज्य के बहुत समीप है। वे कहते है कि राष्ट्रीयता तथा राज्य को मिलाकर राष्ट्र बन जाता है।२ गिलक्राइस्ट जी राष्ट्र को राज्य के अत्यन्त समीप बताते है तथा एक-दूसरे को एक-दूसरे का पूरक मानते है। उनके अनुसार किसी एक के अथवा राष्ट्रीयता और राज्य के अभाव में राष्ट्र का निर्माण नहीं किया जा सकता। अतः राष्ट्र के लिए राष्ट्रीयता तथा राज्य दोनों का होना महती आवश्यक है। हैज के अनुसार- राष्ट्रीयता, राजनीतिक एकता तथा सत्ताधारी स्वतन्त्रता को प्राप्त करके राष्ट्र बन जाता है।३ श्री हैज के इन शब्दों का अभिप्राय यह है कि राष्ट्रीयता, राजनीतिक एकता तथा सत्ताधारी स्वतन्त्रता के अभाव में राष्ट्र के स्वरूप की कल्पना नहीं की जा सकती है। रैम्जेभ्योर के अनुसार- राष्ट्र एक ऐसा समूह होता है जिसके सदस्य स्वभावतः आपस में कई प्रकार की समानताओं से बँधे होते हैं। ये समानताएँ इतनी सुदृढ़ और वास्तविक होती है कि वे प्रसन्नता के साथ रह सकते हैं और यदि उन्हें अलग-अलग कर दिया जाये, तो वे असन्तुष्ट रहेंगे, साथ ही ऐसे व्यक्तियों के अधीन रहना नहीं चाहते, जो कि उस जन समूह से उन समानताओं द्वारा न बँधे हुए हो।४ उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि राष्ट्र ऐसे व्यक्तियों का समूह होता है जो स्वभाव से अर्थात् अन्तर्मन से ऐसे बन्धन में बँधे होते हैं जिसे देखा नहीं जा सकता अर्थात् अनुभव किया जा सकता है। वहीं बन्धन उनकी एकता अर्थात् राष्ट्रीयता कहलाता है और जिसके अभाव में वह डाल से टूटे हुए मुरझे हुए पुष्प के समान स्वयं को अनुभव करते हैं। डा० गार्नर के शब्दों में- राष्ट्र पारस्परिक समानता रखने वाले व्यक्तियों का १. आर०सी० अग्रवाल की भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन एवं संवैधानिक विकास, पृ० सं. ३ २. आर०सी० अग्रवाल की राष्ट्रीय आन्दोलन एवं संवैधानिक विकास, पृ० ३ ३. उपर्युक्त पृ० सं. ३ ४. आर०सी० अग्रवाल की राष्ट्रीय आन्दोलन एवं संवैधानिक विकास, पृ० ३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 13 एक संगठित समूह है, उन व्यक्तियों का जो अपनी पारस्परिक समानता के प्रति सजग होते हैं।१ गार्नर महोदय की परिभाषा इस ओर संकेत करती है कि राष्ट्र उन व्यक्तियों का समूह कहलाता है जिनमें पारस्परिक समानता होती है, जिसके प्रति वे सदैव सजग रहते हैं। साम्यवादी विचारक स्तालिन के अनुसार– राष्ट्र ऐतिहासिक प्रक्रिया से निर्मित वह स्थायी जनसमुदाय है जिसका निर्माण समान भाषा, भूमि, आर्थिक जीवन और समान संस्कृति के रूप में अभिव्यक्त एक से मानसिक गठन के आधार पर हुआ हो।२ उपर्युक्त विचार से स्पष्ट है कि राष्ट्र अपने मूल निर्माणक तत्त्वों जैसे समान भाषा, भूमि, आर्थिक स्तर, संस्कृति पर मूलतः निर्भर होता है जिनका आधार है समस्त जनसमुदाय का समान मानसिक संगठन तथा देश के प्रति सच्ची भक्ति। प्रादियर फोदरे के अनुसार– जिन-जिन तत्त्वों के सयुंक्त रूप से 'राष्ट्र' शब्द का बोध होता है, वे हैं– प्रजाति, भाषा, रीति-रिवाज तथा धर्म।'३ फ्रांस के लेखक प्रादियर फोदरे ने राष्ट्र को इन चारों– प्रजाति, भाषा, रीतिरिवाज तथा धर्म के संयुक्त को 'राष्ट्र' शब्द से अभिहित किया है। यहाँ पर इन्होंने इन चारों के व्यापक रूप को प्रस्तुत किया जैसे प्रजाति से तात्पर्य उनका समस्त मानव जाति से है न कि किसी जाति विशेष से। इसी प्रकार भाषा से तात्पर्य उनका राष्ट्रभाषा से है। रीति-रिवाज से संस्कृति विशेष से है जो राष्ट्र के गौरव की कथा कहती है, जो प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्र से जोड़ती है। इसी प्रकार धर्म से तात्पर्य यहाँ मानव धर्म से है न कि हिन्दू या मुस्लिम धर्म विशेष से। हॉलैड रोज के अनुसार– राजनीतिक दृष्टि से संगठित जनता को ही राष्ट्र कहते हैं। रोज के अनुसार राजनैतिक दृष्टि से जब राष्ट्र के समस्त तत्त्व होते हैं और राजनैतिक दृष्टि से शासन व्यवस्था सुचारु रूप से चलती रहती है वही सुसंगठित जनता अर्थात् समाज ही राष्ट्र कहलाने लगता है। नेविको के अनुसार– राष्ट्र एक सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक एकता है और वह सामाजिक विकास का सर्वोत्कृष्ट उत्पादन होता है।४ १. आर०सी० अग्रवाल की राष्ट्रीय आन्दोलन एवं संवैधानिक विकास, पृ० ३ २. सत्यनारायण दुबे की आधुनिक राजनीतिक विचारधाराएँ, पृ० ३३१ ३. डा० आर०पी० साहनी की राजनीति शास्त्र के सिद्धान्त, पृ० १५९ ४. डा० इकबाल नारायण की राजनीति शास्त्र के मूल सिद्धान्त, पृ० ८० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 14 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता ब्लुंशली के मतानुसार- राष्ट्र ऐसे व्यक्तियों का समूह होता है जो विशेषतः भाषा और प्रथाओं द्वारा परस्पर एक-सी सभ्यता में आबद्ध होता है और जिसके कारण उसमें एकता तथा सब विदेशियों से पृथकता का भाव उत्पन्न हो जाता है।१ ब्लुंशली जी ऐसे व्यक्तियों के समूह को राष्ट्र कहते है जिनकी विशेष रूप से भाषा, प्रथा, सभ्यता एक हो तथा वह सब एकता के सूत्र मे गुँथे होने के साथ- साथ विदेशियों से पृथक् उनकी अपनी अलग पहचान हो। उपर्युक्त विचारों से स्पष्ट है कि सभी ने अपने-अपने मतानुसार राष्ट्र के स्वरूप को परिभाषित करने का प्रयास किया और एकता, समानता जिसके आवश्यक अंग हैं। राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के आधार तत्त्व “वसुधैव कुटुम्बकम्" भारतीय संस्कृति का एक आदर्श है। इस आदर्श की संकल्पना वैदिक है। हमारे धर्मग्रन्थों में इसको उल्लिखित किया गया है। हमारे वैदिक ऋषियों ने समग्र मानवता को एक माना है, सबके कल्याण की कामना की है। यथा :— सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥२ ऋग्वेद के निम्न मंत्र में भी मानव मात्र की समता की झलक स्पष्ट दिखाई पड़ती है। अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते संभ्रातरो वावृधुः सौभगाय। युवा पिता स्वसा रुद्र एषां सुदुघा पृशिनः सुदिना मरूद्द्भ्यः॥३ वेदों में वर्णित समता, सहृदयता और स्नेह का यह आदर्श अधिकांशतः मानव जाति के सन्दर्भ में प्रतिष्ठित हुआ है। यही भावना आगे चलकर उपनिषदों और गीता में विस्तारित हुई है। परम एकत्व के आदर्श के अन्तर्गत समस्त प्राणियों और वनस्पतियों तक के प्रति भी समभाव प्रकट किया गया है। १. उपर्युक्त, पृ० ८० २. संस्कृत परिचायिका, पृ० ५९ (मुख्यतः 'पद्मपुराण' से) ३. ऋग्वेद ५/६०/५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 15 सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥१ अद्वैत वेदान्त में समस्त प्राणियों में एक ही ईश्वर की सत्ता स्वीकार की गयी है। यहाँ अपने और पराये के लिए कोई स्थान ही नहीं है। सभी प्राणी समान है, सभी के भाव एवं विचार समान है, एक हैं। सभी एकता के अटूट बन्धन में उसी प्रकार गुथे हुए हैं जिस प्रकार माला में मोती। राष्ट्रीय एकता एक ऐसी भावना है जिसके अनुसार राष्ट्र के समस्त निवासी एक-दूसरे के प्रति सद्भावना रखते हुए राष्ट्र की उन्नति हेतु परस्पर मिलकर कार्य करते हैं। वस्तुतः यह एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जो राष्ट्र का एकीकरण करते हुए उसके निवासियों में पारस्परिक बन्धुत्व और राष्ट्र के प्रति निजत्व का भाव जाग्रत करते हुए राष्ट्र को सुसंगठित और सशक्त बनाती है। इस प्रकार राष्ट्रीय एकता भाषा, धर्म, जाति, सम्प्रदाय, संस्कृति और सभ्यता की भिन्नता होते हुए भी उन्हें एकता के सूत्र में बाँधकर राष्ट्र को सुदृढ़ बनाने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देती है। राष्ट्रीय एकता राष्ट्र रूपी शरीर में आत्मा के समान है। जिस प्रकार आत्माविहीन शरीर प्रयोजनहीन हो जाता है उसी प्रकार राष्ट्र भी राष्ट्रीय एकता के अभाव में टूट जाता है। राष्ट्रीय एकता के लिए भाषा, धर्म, जाति और संस्कृति की एकता आवश्यक नहीं होती और विविधता बाधक नहीं बनती। राष्ट्रीय एकता तो विविधता के बीच ही जन्म लेती हुई फूलती और फलती है। हमारा देश भारत एक ऐसा ही देश है। यहाँ भाषा, धर्म, जाति, सम्प्रदाय, संस्कृति और सभ्यता आदि की भिन्नता पायी जाती है। लेकिन फिर भी यह एक गौरवशाली राष्ट्र है और राष्ट्रीय एकता इसकी मौलिक विशेषता है। राष्ट्रीय एकता से सम्बन्धित कुछ प्रमुख विचार राष्ट्रीय एकता सम्मेलन के अनुसार– “राष्ट्रीय एकता एक मनोवैज्ञानिक एवं शैक्षिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा लोगों के दिलों में एकता, संगठन एवं सन्निकटता की भावना, सामान्य, नागरिकता की भावना और राष्ट्र के प्रति भक्ति की भावना का विकास किया जाता है।”२ नवभारत टाइम्स के प्रधान सम्पादक श्री अक्षय कुमार जैन के अनुसार–


१. गीता ६/२९ २. आधुनिक सामाजिक विज्ञान / लेखक उदयवीर तथा शकुन्तला सक्सेना, पृ० ३३३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

16 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता "अनेकता में एकता इस प्रकार बैठी है जैसे शरीर में भिन्न-भिन्न अवयवों के होते हुए भी रीढ़ की हड्डी में चलता हुआ स्नायु मंडल।''१ महात्मा गाँधी के अनुसार- ''एकता क्या चीज है और उसे किस तरह बढ़ाया जा सकता है? इसका उत्तर सीधा सादा है। एकता के लिए आवश्यक यह है कि हम सब लोगों का उद्देश्य एक हो, लक्ष्य एक हो तथा हमारी तकलीफें भी एक समान हो। एकता को प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि एक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक-दूसरे के साथ सहयोग किया जाये, दूसरों के दुःखों में हिस्सा बँटाया जाए और परस्पर सहिष्णुता बरती जाये।''२ उपर्युक्त विचारों से स्पष्ट है कि एकता अर्थात् राष्ट्रीय एकता वह भावना है जो समस्त जन-जन के हृदय में विद्यमान रहती है, जिससे प्रेरित होकर वह एकता के सूत्र मे बँध जाते हैं। अखण्डता शब्द से अभिप्राय है खण्डित न होने वाली स्थिति या प्रक्रिया अर्थात् जिसका खण्डन न किया जा सके। राष्ट्रीय अखण्डता को कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है। राष्ट्रीय संविधान का सम्पूर्ण राष्ट्र में समान रूप से लागू होना। राष्ट्रीय अखण्डता भौगोलिक सीमाओं और भूखण्डों से प्रभावित होते हुए भी एक संविधान सूत्र के अन्तर्गत विभिन्न प्रान्त व भूखण्डों का एक राष्ट्र के रूप में स्थापित होना। राष्ट्रीय अखण्डता एक संविधान के अन्तर्गत राष्ट्रीय एकता के आधार पर बनी रह सकती है। जैसे भारतवर्ष एक विशाल राष्ट्र है जो विभिन्न प्रान्तीय भूखण्डों में विभक्त होते हुए भी एक संविधान के अन्तर्गत अपनी अखण्डता को बनाये हुए है। जिसकी अखण्डता पर प्रान्तीय भूखण्डों, विचारधाराओं, धर्म, जातियों, सम्प्रदायों की विभिन्नताओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। राष्ट्रीय अखण्डता के कारण ही राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक सम्पूर्ण राष्ट्र को अपना घर समझता है और उसके किसी भी स्थान पर उसका जन्मसिद्ध अधिकार होता है चाहे वह किसी भी प्रान्त, धर्म, सम्प्रदाय जाति अथवा विचारधारा से सम्बन्धित हो। एक अखण्ड राष्ट्र ही राष्ट्रीय एकता स्थापित रख सकता है। इस प्रकार राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता में घनिष्ठ सम्बन्ध है। राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक तत्त्वों पर आधारित होती है। ये सभी तत्त्व एक-दूसरे से आबद्ध होते हैं। राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के आधार तत्त्व मुख्यतः निम्न हैं।

१. हाईस्कूल सामाजिक विज्ञान भाग-१, पृ० ३६३ २. महात्मा गाँधी का सन्देश : संकलन और सम्पादन, यू० एस० मोहनराव, पृ० ८२

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 17 १. भौगोलिकता २. नागरिकता ३. धर्म ४. राष्ट्रभाषा ५. राष्ट्रीय प्रतीक ६. राष्ट्रीय पर्व ७. सामाजिक समानता ८. साहित्य ९. संस्कृति १. भौगोलिकता- राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के निर्माण हेतु भौगोलिक एकता अत्यन्त आवश्यक तत्त्व है जिसके अभाव में नागरिकों में एकरूपता उत्पन्न नहीं हो पाती और वह अपनी भाषा, संस्कृति से तादात्म्य भी स्थापित नहीं कर पाते। भौगोलिक स्थिति, जलवायु तथा रहन-सहन का मनुष्य पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। भौगोलिक एकता के कारण ही अखण्ड राष्ट्र की कल्पना की जा सकती है। भौगोलिक एकता एवम् अखण्ड राष्ट्र पर बल देते हुए रूथना स्वामी कहते है कि "किसी देश की जनता में भले राजनीतिक तथा धर्म के कारण विभिन्नता पैदा हो जाये, किन्तु एक देश में निवास और देश-प्रेम की भावना उसे एकता के सूत्र में बाँधे रहती है।'"१ गिलक्राइस्ट के शब्दों में- एक निश्चित भू-भाग पर निरन्तर एक साथ रहना राष्ट्रीयता के विकास के लिए आवश्यक है।२ उपर्युक्त विचारों से स्पष्ट है कि राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रीय अखण्डता के विकास में भौगोलिक एकता का अपना महत्त्वपूर्ण योगदान है, जिसका प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक गठन, सामाजिक जीवन तथा चरित्र पर अवश्य ही पड़ता है। २. नागरिकता- नागरिकता नागरिक शब्द की भाववाचक संज्ञा है। नागरिकता से नागरिक के उन अधिकारों और कर्त्तव्यों का बोध होता है जो उसे राष्ट्र की ओर से मिले हुए रहते हैं तथा नागरिक की श्रेणी प्रदान करते हैं। यह एक वैधानिक स्थिति है जो १. नागरिक शास्त्र के सिद्धान्त, पृ० ४०७ २. नागरिक शास्त्र के सिद्धान्त, पृ० ४०७ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 18 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता व्यक्ति को राष्ट्र से जोड़ती है और राष्ट्र द्वारा प्रदत्त सामाजिक तथा राजनीतिक भौगोलिक अधिकारों के उपयोग एवं उसके बदले में राष्ट्रों के प्रति कर्त्तव्यों के पालन का विश्वास दिलाती है। इस प्रकार नागरिकता एक ऐसी भावना है जो नागरिक के हृदय में अपनेपन के भाव को जाग्रत करती है जिससे नागरिक अपने आपको राष्ट्र का अंग समझने लगते हैं, राष्ट्र के उत्थान को अपना उत्थान तथा पतन को अपना पतन मानते हैं। उनकी यही भावना राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ तथा अखण्ड राष्ट्र की निर्माणक है। राष्ट्र की उन्नति हेतु ही आदर्श नागरिक अपने हितों का त्याग करने में तनिक भी संकोच नहीं करते। पवित्र धर्मग्रन्थ मनुस्मृति में त्याग की इस भावना का कितना सटीक वर्णन किया गया है जैसे- त्यजेद्देहं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्। ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत॥ १ अर्थात् मनुष्य को अपने कुल के लिए देह का, ग्राम के लिए कुल का, देश के लिए ग्राम का और आत्मारूपी मानवता के लिए पृथ्वी तक का त्याग कर देना चाहिए। त्याग की भावना तथा राष्ट्र की उन्नति ही नागरिकता की आधारशिला है। ३. धर्म- अखण्ड राष्ट्र तथा राष्ट्रीय एकता के निर्माण में वैदिक काल से ही धर्म का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। धर्म अत्यधिक व्यापक शब्द है। व्यक्ति जो कुछ धारण करता है वही उसका धर्म है जैसे 'धारयति इति धर्मः'। जिससे उसे अभ्युदय व निःश्रेयस से पारलौकिक उन्नति का बोध होता है। महाभारत में भीष्म पितामह ने धर्म की व्याख्या इस प्रकार की है कि धर्म शब्द 'धृ' धातु से बना है जिसका अर्थ है धारण करना। अभ्युदय, अपीड़न और धारण अर्थात् संरक्षण जिस उपाय से हो, वही धर्म है। धर्म में ही वह क्षमता है जिससे जगत् का संरक्षण होता है। धर्म के कारण ही व्यक्ति अपने स्थान अथवा पद में बन रहते हैं। जो जगत् की स्थिति का कारण हो और प्राणियों की प्रत्यक्ष उन्नति एवं मोक्ष प्राप्ति का हेतु बने, वही धर्म है।२ श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार- "यज्ञ, दान, तप रूप, कर्म अर्थात् विश्वरूप परमेश्वर की अखण्ड तथा अनन्य भाव से सेवा ही धर्म है।"३ १. मनुस्मृति। २. महाभारत, शान्तिपर्व, अध्याय १०९, श्लोक १०-१२. ३. श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय १८, श्लोक ५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 19 वैदिक विद्वानों के अनुसार- धर्म वह है जिससे अभ्युदय व निःश्रेयस की सिद्धि हो। अभ्युदय से लौकिक तथा निःश्रेयस से पारलौकिक उन्नति एवं कल्याण का बोध होता है। उपर्युक्त विचारों से स्पष्ट है कि धर्म के द्वारा ही सम्पूर्ण संसार का अर्थात् राष्ट्र का संरक्षण तथा उन्नति सम्भव है क्योंकि धर्म से ही प्रत्येक जन के हृदय में सेवा भाव जाग्रत होता है। दूसरों की सेवा करना ही मानव धर्म है जैसे कहा भी गया है- “परेषाम् उपकारः परोपकारः।” धर्म से ही व्यक्तियों में बन्धुत्व की भावना जाग्रत होती है, परन्तु आज के युग में धर्म को राष्ट्रीय एकता के निर्माण का प्रमुख आधार तत्त्व मानने में विवाद है। क्योंकि आज अनेक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रों की स्थापना हो गयी है, जिस प्रकार हमारा भारतवर्ष। परन्तु धर्म का राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्र की अखण्डता बनाये रखने में महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि धर्म मानवता का सन्देश देता हुआ व्यक्ति को परमात्मा से जोड़ता है अर्थात् जीव तथा आत्मा के सम्बन्धों का विश्लेषण करता है। इस प्रकार धर्म ही व्यक्ति को बुराइयों से बचाता है और अच्छाइयों को अपनाने की प्रेरणा प्रदान करता है। व्यक्ति के विकास हेतु धर्म के लक्षणों को इस प्रकार लक्षित किया है- धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥१ अर्थात् धैर्य, क्षमा, विषय-भोगों का दमन करना, चोरी न करना, बाहर-भीतर की स्वच्छता, इन्द्रिय-निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध- ये धर्म के दस लक्षण हैं। निस्सन्देह इन गुणों को अपनाने से व्यक्ति के विकास में कोई सन्देह नहीं है। जब व्यक्ति का वैयक्तिक विकास होगा तभी वह अपने ही धर्म की भाँति सभी धर्मों का समादर करेगा। परमात्मा सभी धर्मों का मूल है। जब परमात्मा एक है तो सभी धर्म एक ही है भले ही हम उसे अपनी भाषा सुविधानुसार किसी भी नाम से पुकारे। इस प्रकार धर्म राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रीय अखण्डता को व्यापकता प्रदान करता है तथा राष्ट्र की एकता तथा अखण्डता को महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करता है। ४. राष्ट्रभाषा- राष्ट्रीय एकता के निर्माण में भाषा की एकता भी महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। समान भाषा के परिणाम-स्वरूप ही लोगों में परस्पर अपनत्व की भावना का प्रादुर्भाव होता है। राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डराष्ट्र को स्थिरता प्रदान करने में भाषा, जाति, १. मनुस्मृति CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 20 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता समुदाय की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होती है। प्रत्येक राष्ट्र में बोली जाने वाली विविध भाषाओं में से जिस भाषा को संविधान द्वारा राष्ट्रभाषा घोषित किया जाता है वही भाषा राष्ट्रभाषा कहलाती है। उस भाषा में ही राष्ट्र के समस्त कार्य होते हैं तथा अन्य भाषाओं की अपेक्षा उसका सर्वाधिक महत्त्व होता है। अतः बहुभाषी होते हुए भी प्रत्येक राष्ट्र में एक राष्ट्रभाषा होना अति अनिवार्य है। गाँधी जी ने कहा था- “राष्ट्रभाषा के बिना प्रत्येक वह राष्ट्र गूँगा है।” जिस प्रकार भारत बहुभाषी राष्ट्र है। यहाँ संविधान द्वारा १४ भाषाएँ मान्य हैं। भाषा की इस अनेकता में एकता को प्रतिपादित करने का श्रेय संविधान द्वारा हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रदान किया गया है। हिन्दी में वह सभी गुण विद्यमान है जो राष्ट्रभाषा बनने हेतु अपेक्षित है। यह अन्य भाषाओं की अपेक्षा सरल और बोधगम्य है। इसका साहित्य विशाल तथा पूर्ण है। विदेशी भी कुछ समय में ही थोड़े से परिश्रम से सरलता से सीख सकते हैं और भारतीयों से उनकी राष्ट्रभाषा में ही पारस्परिक सम्पर्क, सद्भाव और सहयोग स्थापित कर सकते हैं। इस प्रकार राष्ट्रभाषा राष्ट्रीय एकता को बनाये रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। “राष्ट्रीय भावनाओं को जाग्रत करने का सफल आधार होने के कारण कई विद्वानों ने भाषा की एकता को महत्त्वपूर्ण बताया है।” ५. राष्ट्रीय प्रतीक एवम् चिह्न- प्रत्येक राष्ट्र के अपने राष्ट्रीय प्रतीक तथा चिह्न होते हैं जो राष्ट्र को अन्य राष्ट्रों से भिन्न करते हैं तथा उसकी पहचान बनाते हैं। ये प्रतीक चिह्न राष्ट्र को एकरूपता प्रदान करते हैं। जिस प्रकार हमारे राष्ट्र भारतवर्ष के राष्ट्रीय प्रतीक- राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान और भारत सरकार का राष्ट्रीय चिह्न भारत के प्रमुख प्रतीक हैं, जो राष्ट्र को एकरूपता की डोरी में बाँधे हुए हैं। राष्ट्रीयध्वज हमारी स्वतन्त्रता, एकता तथा समानता का प्रतीक है। इसमें केसरिया, श्वेत और हरा रंग है, जो जागृति, शौर्य, त्याग, सत्य, पवित्रता तथा समृद्धि के प्रतीक हैं। मध्य में स्थित नीले रंग का चक्र धर्म तथा ईमानदारी का। प्रसिद्ध कवि रविन्द्रनाथ टैगोर द्वारा लिखित 'जन गण मन' राष्ट्रगान ध्वज फहराने के तुरन्त बाद सावधान की मुद्रा में गाया जाता है। भारत सरकार के दो भाग है- शीर्ष और आधार। शीर्ष की ओर बने सिंह साहस और शक्ति के प्रतीक हैं, शीर्ष के नीचे देवनागरी लिपि में 'सत्यमेव जयते' लिखा है। आधार के बांयी, दांयी ओर बना घोड़ा और वृषभ ताकत और चाल तथा कठिन परिश्रम और स्फूर्ति के तथा इनके मध्य बना चक्र धर्म का प्रतीक है। यह चिह्न सभी नोटों, सिक्कों तथा सरकारी पुस्तकों पर देखा जा सकता है। इस प्रकार राष्ट्रीय प्रतीक एवम् चिह्न राष्ट्रीय एकता के सन्देश वाहक है जो राष्ट्र की अलग पहचान बनाते हैं अर्थात् राष्ट्र को परिचय CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

प्रथम अध्याय 21 प्रदान करते हैं। ६. राष्ट्रीय पर्व- राष्ट्रीय एकता एवम् भावात्मक एकता को बढ़ाने में राष्ट्रीय पर्वों का अपना विशेष महत्त्व है। इन पर्वों को सभी देशवासी चाहे वह किसी भी वर्ग अथवा सम्प्रदाय के हो एक साथ मिल-जुलकर प्रेमपूर्वक मनाते हैं। जिससे उनमें पारस्परिक भेद-भाव, ऊँच नीच की भावना मिट जाती है। राष्ट्र को ही सर्वश्रेष्ठ धर्म मानते हुए राष्ट्रीयएकता के प्रति सदैव सजग रहते हैं तथा अखण्डराष्ट्र के संरक्षण हेतु सदैव तत्पर रहते हैं और राष्ट्रीयएकता एवम् राष्ट्रीयअखण्डता में बाधक तत्त्वों का निराकरण करते हैं। इस प्रकार राष्ट्रीय पर्व अखण्ड राष्ट्र के निर्माण में सहायक हैं और उसके प्राणतत्त्व राष्ट्रीय एकता के आधार स्तम्भ है। ७. सामाजिक समानता- सामाजिक समानता का अर्थ है समाज के सभी व्यक्तियों को समान समझना। रूप, रंग, जाति, धर्म, लिंग, धनी, निर्धन आदि के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि राष्ट्र की महत्त्वपूर्ण निधि राष्ट्रीयएकता को तभी बनाये रखा जा सकता है जब समाज में सामाजिक समानता व्याप्त हो और तभी राष्ट्र की अखण्डता बनी रह सकती है। जब तक समाज में विषमताएँ व्याप्त रहेंगी तब तक राष्ट्रीयएकता एवम् राष्ट्रीयअखण्डता के मार्ग में कठिनाईयाँ आती ही रहेंगी। समाज की नींव खोखली हो जायेगी और राष्ट्र टूट जायेगा। अतः सामाजिक असमानता को समाप्त करके ही राष्ट्र की महत्त्वपूर्ण निधि को बचाया जा सकता है क्योंकि सामाजिक समानता ही एक ऐसा तत्त्व है जो राष्ट्र की एकता तथा अखण्डता को सुरक्षा प्रदान कर सकता है अन्य कोई नहीं। भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन से स्पष्ट शब्दों में कहा है कि "सर्वश्रेष्ठ पुरुष वह है जो सबको अपने समान ही समझे।" ८. साहित्य- "हितेन सहितमिति सहितम्। सहितस्य भावमिति साहित्यम्" अर्थात् हितपूर्ण भावों को ही साहित्य कहते है। साहित्य के सम्बन्ध में रविन्द्रनाथ टैगोर ने कहा है कि "साहित्य शब्द से साहित्य में मिलने अर्थात् एक साथ होने का भाव देखा जाता है, वह मिलन मनुष्य का मनुष्य के साथ, अतीत का वर्तमान के साथ, दूर का निकट के साथ अत्यन्त अन्तरंग मिलन है।" 'साहित्य' साहित्यकार की वह अमरकृति है जो समाज में चेतना का मन्त्र फूँकती है जिससे अकर्मण्य, आलसी व निराश लोगों CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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22 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के मन में भी नई चेतना और प्राण आ जाते हैं। इस प्रकार सामाजिक वातावरण सुखद और सुन्दर बना रहता है। भर्तृहरि ने तो साहित्य-रहित मनुष्य को पुच्छ-विहीन पशु की उपाधि से विभूषित कर दिया है। यथा- साहित्य संगीत कला विहीनः। साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः ॥ इस प्रकार सत् साहित्य गंगा के समान सबका हित करता है तथा सत्यं शिवं सुन्दरम् की कल्याणमयी भावना से युक्त होता है। आचार्य मम्मट ने भी अपने काव्यप्रकाश में काव्य का लक्षण करते हुए "शिवेतरक्षतये" १ को ही काव्य के अन्य गुणों की अपेक्षा अधिक महत्त्व दिया है। साहित्य सम्पूर्ण राष्ट्र, व्यक्ति, समाज पर अपना विशेष प्रभाव डालता है जिससे राष्ट्रीयएकता को बल मिलता है। साहित्य के माध्यम से ही हम अपनी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति, धर्म तथा आचार-विचार से भलीभांति परिचित होते हैं तथा साहित्य द्वारा निर्दिष्ट आदर्शों पर चलने की प्रेरणा पाकर स्वयं को गौरवान्वित करते हैं। साहित्य ही एक ऐसा आधार तत्त्व है जो किसी भी राष्ट्र में व्याप्त अशान्ति को शान्त कर राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता को स्थायित्व प्रदान कर सकता है। जैसे भारत के वैदिक तथा लौकिक साहित्य की विशाल निधि इसका उत्तम उदाहरण है। जिसमें सर्वत्र राष्ट्रीय एकता एवम् राष्ट्रीय अखण्डता परक भावों की झलक दिखायी पड़ती है। इस प्रकार 'साहित्य' राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता रूपी शरीर का रक्त है। ९. संस्कृति- 'संस्कृति' शब्द का सामान्य अर्थ है संशोधन करना अर्थात् परिष्कार करना। जो संस्कार आत्मा अथवा चित्त का परिष्कार करते हैं वही संस्कृति कहलाते हैं। संस्कृति ही एक ऐसा आधार स्तम्भ है जो राष्ट्र की अखण्डता तथा उसकी अलौकिक निधि राष्ट्रीय एकता को बनाये रखती है। संस्कृति ही मानवमन से अपने-पराये के क्षुद्र विचारों की संकीर्णता रूपी अज्ञान को दूर कर 'वसुधैव कुटुम्बकम्' अर्थात् ज्ञान की ज्योति प्रकाशित कर अमरत्व रूपी शान्ति प्रदान करती है तथा निःश्रेयस कल्याण की भावना का विस्तार करती है। सभी राष्ट्रों की अपनी संस्कृति होती है और अपनी संस्कृति के कारण ही प्रत्येक राष्ट्र की अपनी पहचान होती है। मुख्यतः राष्ट्रों का झुकाव अपनी संस्कृति की ओर विशेषतया रहता है क्योंकि राष्ट्र जितना अपनी संस्कृति को महत्त्व देता है उतना १. आचार्य मम्मट का काव्यप्रकाश

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 23 सम्भवतः किसी को नहीं। राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता को संस्कृति धर्म, दर्शन, विचारों, कविता, संगीत और कला के माध्यम से स्थायित्व प्रदान करती है तथा अपने पराये के भाव को समाप्त कर सम्पूर्ण पृथ्वी को कुटुम्ब के रूप में मानने की प्रेरणा प्रदान करती है। जैसे हिन्दू पुराण के अनुसार— अयं निजः परः वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥१ अर्थात् अपना और पराया आदि भाव क्षुद्र व्यक्तियों के हृदय में ही उत्पन्न होते हैं। उदार हृदय व्यक्ति तो समस्त विश्व को ही एक कुटुम्ब के रूप में अनुभव करते हैं। इस प्रकार संस्कृति मनुष्य के क्षुद्र अर्थात् संकीर्ण विचारों को त्याग कर विस्तृत विचारों को अपनाने की प्रेरणा प्रदान करती है। जैसे हमारा राष्ट्र भारत एक धर्मावलम्बी देश है और यहाँ की संस्कृति भी धार्मिक भावना से ओत-प्रोत है। धर्म से तात्पर्य यहाँ कल्याण तथा सबके सुखी रहने की भावना से है। इस प्रकार भारतीय संस्कृति धार्मिक, आध्यात्मिक तथा विश्व-बन्धुत्व की भावना से अनुप्राणित है। यथा— सर्वेभवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भाग्भवेत्॥२ उपर्युक्त वैदिक मन्त्र का स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सारी आयु जाप किया तथा उपदेश दिया। उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि विश्वशान्ति और विश्वबन्धुत्व भारतीय संस्कृति का मूल है। "सा प्रथमा संस्कृतिः विश्ववारा"— यह संस्कृति विश्व की सबसे प्रधान तथा प्राचीन संस्कृति है। अपनी संस्कृति के कारण ही भारत सदैव अमर रहेगा। स्वामी विवेकानन्द ने भारतीय संस्कृति को इस प्रकार अपने शब्दों में व्यक्त किया है। "भारतीय संस्कृति पश्चिमी संस्कृति की अपेक्षा श्रेष्ठ है क्योंकि पश्चिमी संस्कृति भौतिकवादी है, जबकि भारतीय संस्कृति आध्यात्मवादी है, इसलिए भारतीय राष्ट्र अमर है।'"३ इस प्रकार भारतीय संस्कृति अक्षुण्ण, सनातन तथा राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता की द्योतक है। १. हिन्दू पुराण २. संस्कृत परिचायिका ३. आर० सी० अग्रवाल की भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन एवम् संवैधानिक विकास, पृ० १ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 24 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता का प्रयोजन :- राष्ट्र का मूल प्रयोजन होता है समस्त देशवासियों का शैक्षिक, नैतिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक, शारीरिक एवं मानसिक, अर्थात् प्रत्येक दृष्टि से नागरिकों का सर्वतोमुखी विकास करना, क्योंकि जब तक नागरिकों का सर्वतोमुखी विकास नहीं होगा तब तक वह स्वयं से असन्तुष्ट रहेंगे तथा अनेक दुर्गुणों से स्वयं को लिस पायेंगे तथा असन्तुष्ट और (अशिक्षित) असभ्य व्यक्ति से राष्ट्रीय एकता अथवा राष्ट्रहित और राष्ट्रीय अखण्डता की अपेक्षा करना निस्सार है। इस प्रकार राष्ट्रीय एकता एवम् राष्ट्रीय अखण्डता का प्रयोजन है सर्वप्रथम मनुष्य के सर्वतोमुखी विकास हेतु समानावसर प्रदान करना तथा उसमें आदर्श नागरिकता का संचार करना। आदर्श नागरिकता का संचरण तभी किया जा सकता है जब व्यक्ति सुशिक्षित हो क्योंकि शिक्षा ही मनुष्य का सर्वाङ्गीण विकास करती है। गाँधी जी ने भी इस सम्बन्ध में कहा है कि "शिक्षा जो आत्मा की रोटी है, स्वस्थ नागरिकता की प्रथम शर्त है।"१ उपर्युक्त विचार से सहमत बेनी प्रसाद जी ने भी अपना मत इस प्रकार प्रस्तुत किया है। "शिक्षा अच्छे नागरिक जीवन के वृत्तखण्ड की आधार शिला है शिक्षा समान अवसर लाती है जो नागरिक जीवन का मूलतत्त्व है।"२ इस प्रकार आदर्श नागरिकता ही मनुष्य को बुद्धिमान्, संयमी, जागरुक, सुशिक्षित, कर्त्तव्यपरायण, व्यवहार कुशल, निःस्वार्थ, परिश्रमी, मितव्ययी, देशप्रेमी, राष्ट्रीय एकता एवम् राष्ट्रीय अखण्डता का सजग प्रहरी बनने की प्रेरणा प्रदान करती है। राष्ट्रीय एकता के प्रयोजन को सार्थकता प्रदान करने हेतु आवश्यक है— प्रत्येक देशवासी के लिए शिक्षा के समानावसर प्रदान करना। जिसके लिए राष्ट्र के प्रत्येक गाँव में, नगर-नगर में, स्थान-स्थान पर स्कूल कॉलेजों की स्थापना करना तथा प्रौढ़ों के लिए उनके सुविधानुसार शिक्षा के अवसर प्रदान करना। पिछड़े वर्गों तथा निर्धन छात्र-छात्रों के लिए निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करना। प्राथमिक स्तर तक विशेष शिक्षा की व्यवस्था करना जिससे बाल्यकाल से ही राष्ट्रीय एकता की भावना पनप सके और अखण्ड राष्ट्र को प्रत्येक राष्ट्रवासी अपना परिवार तथा प्रत्येक देशवासी को अपना सम्बन्धी समझ सकें।

१. नागरिक शास्त्र के सिद्धान्त, पृ० ३०३ २. नागरिक शास्त्र के सिद्धान्त, पृ० ३०४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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प्रथम अध्याय 25 समस्त देशवासी जाति, धर्म, सम्प्रदाय, प्रान्त आदि को विस्मृत कर सभी मेलों तथा उत्सवों में एक साथ मिल-जुल कर भाग लें तथा एक दूसरे के कल्याण की कामना करें। राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के प्रचार-प्रसार तथा अनुभव योग्य बनाने के लिए शिक्षा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण साधन है जिसकी आज भी प्रत्येक राष्ट्र को आवश्यकता है। शिक्षा के अभाव में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्ड राष्ट्र की कल्पना करना भी निरर्थक है। इसके सम्बन्ध में डा० राधा कृष्णन कहते हैं कि "राष्ट्रीय एकता ईंट और हथोड़े से नहीं बनती। यह लोगों के दिल और दिमाग में चुपके-चुपके विकसित होती है। इसका एकमात्र ढंग शिक्षा का ढंग है।"१ उपर्युक्त विचार से स्पष्ट है कि शिक्षा के माध्यम से ही प्रत्येक व्यक्ति को यह ज्ञान कराया जा सकता है कि राष्ट्र से बड़ा कोई धर्म नहीं है। लोकमान्य बालगंगाधर ने भी राष्ट्र को धर्म से भी ऊँचा स्थान दिया है और राष्ट्र का ईश्वर के साथ एकात्म्य स्थापित किया है। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के अनुसार- "ईश्वर तथा हमारा देश एक-दूसरे से भिन्न नहीं है। संक्षेप में हमारा देश ईश्वर का ही एक रूप है।"२ अतः राष्ट्रीय एकता की भावना को जाग्रत करने हेतु आवश्यक है प्रत्येक जन को स्वदेश के प्रति प्रेम, भक्ति तथा 'हम' की भावना से परिचित कराना तथा उसका महत्त्व समझाना। राष्ट्र की उन्नति में सहायक तत्त्वों से अवगत कराना तथा स्वराष्ट्र का संस्कृति सम्बन्धी ज्ञान प्रदान करना। "राष्ट्र ही सर्वोपरि है।" अतः हमारा अपना अस्तित्व ही हमारा राष्ट्र है और हम राष्ट्र के संरक्षक है। इस प्रकार 'हम' की भावना अर्थात् समानता, एकता की भावना को पुष्पित तथा पल्लवित करने के लिए तथा राष्ट्र की अखण्डता के लिए आवश्यक है राष्ट्र के समस्त प्रान्तों से तथा राष्ट्र में निवास करने वाली समस्त जातियों, सम्प्रदायों से अधिक से अधिक मेल उत्पन्न करना तथा बन्धुत्व की भावना को बढ़ाना तथा राष्ट्रीय भक्ति तथा राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत साहित्य का पठन-पाठन कराना तथा विविध पद्धतियों द्वारा उनको प्रस्तुत करना तथा व्यवहार के योग्य बनाना। स्कूल तथा कॉलेज के पाठ्यक्रम में राष्ट्रीयपरक साहित्य को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान करना। इस प्रकार राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता का प्रयोजन है राष्ट्र को सर्वोपरि महत्त्व

१. कैडेट पत्रिका Vol. 41, 1991 २. सत्यनारायण दुबे की आधुनिक राजनीतिक शास्त्र CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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26 \ वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता प्रदान करना। साम्प्रदायिकता तथा रक्त-पात, बैर-भाव के अर्थहीन झगड़ों को समाप्त कर राष्ट्र में अमन-चैन का सन्देश फैलाना तथा वैदिक साहित्य से प्रेरणा प्राप्त कर सब समान है न कोई छोटा है न कोई बड़ा, इसका प्रचार करना। राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता की अवधारणा राष्ट्रीय एकता से राष्ट्र के समस्त वासियों में ‘हम’ की भावना का बोध होता है। ‘हम’ की भावना से तात्पर्य है राष्ट्रहित के समक्ष अपने वैयक्तिक हितों का त्याग करने में तनिक भी संकोच न करना। जिस राष्ट्र में नागरिक उपर्युक्त गुणों से युक्त होते हैं उनमें ही ‘हम’ की भावना पायी जाती है और यही ‘हम की भावना’ राष्ट्रीय एकता कहलाती है। राष्ट्रीय एकता राष्ट्र का प्राणतत्त्व होती है जिसके बिना राष्ट्र की कल्पना ही निस्सार है। राष्ट्र को सर्वोपरि तथा राष्ट्रहित को ही अपना हित मानते हुए राष्ट्रीय एकता को इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं :- ‘‘जब किसी राष्ट्र के व्यक्तियों में स्थान, जाति, भाषा, धर्म व संस्कृति आदि किसी भी आधार पर भिन्नता होते हुए भी राष्ट्रहित के आधार पर ‘हम’ की भावना होती है और वे राष्ट्रहित के आगे अपने वैयक्तिक हितों का त्याग करते हैं तो इसे राष्ट्रीय एकता कहते है।’’$^१$ राष्ट्रीयएकता के सम्मेलन ने राष्ट्रीयएकता को इस प्रकार परिभाषित किया है :- ‘‘राष्ट्रीयएकता एक मनोवैज्ञानिक एवं शैक्षिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा लोगों के दिलों में एकता, संगठन एवं सन्निकटता की भावना, सामान्य नागरिकता की भावना और राष्ट्र के प्रति भक्ति की भावना का विकास किया जा सकता है।’’$^२$ उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि राष्ट्रीयएकता का स्वरूप अमूर्त है जिसे देखा नहीं जा सकता बल्कि अनुभव किया जा सकता है। जिसकी प्रकृति मनोवैज्ञानिक है, जो देशवासियों के हृदय में राष्ट्र के प्रति प्रेम, भक्ति, त्याग, बलिदान, संगठन, भाईचारे की भावना को जन्म देती है और जो अखण्ड राष्ट्र की निर्माणक है। ‘‘नवभारत टाइम्स’’ के प्रधान सम्पादक श्री अक्षय कुमार जैन ने राष्ट्रीयएकता को कुछ इस प्रकार परिभाषित किया है :- १. रमन बिहारी लाल की ‘शिक्षा के दार्शनिक और समाजशास्त्रीय सिद्धान्त’ रस्तौगी पब्लिकेशन्स, शिवाजी रोड, मेरठ, पृ० ६५ २. आधुनिक सामाजिक विज्ञान-१ लेखक- उदयवीर सक्सेना एवं शकुन्तला सक्सेना, पृ० ३३३

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प्रथम अध्याय 27 “अनेकता में एकता इस प्रकार बैठी है जैसे शरीर में भिन्न-भिन्न अवयवों के होते हुए भी रीढ़ की हड्डी में चलता हुआ स्नायु मंडल।”१ श्री जैन ने राष्ट्र को मानव शरीर की उपमा देते हुए कहा है- राष्ट्र एक मानव शरीर है। उसमें विभिन्न विचारधाराओं और मतों को मानने वाले विभिन्न धर्मों के लोग भिन्न-भिन्न अवयवों की भाँति होते हैं। भिन्न अवयवों को रीड़ की हड्डी एक शरीर के रूप में स्थापित रखती हैं, परन्तु इस आधार स्तम्भ रीड़ की हड्डी में बहुत ही सूक्ष्म स्नायु मंडल अनेकता के रूप में विद्यमान रहते हैं। यही अनेकता में एकता का मूल सार है। राष्ट्रीय शैक्षणिक नियोजन एवं प्रशासन संस्थान, नई दिल्ली के निदेशक प्रो० यूनिस रजा के अनुसार “विकास का मनोविज्ञान हमें सिखाता है कि एकता और विभिन्नता की प्रक्रिया परस्पर विरोधी न होकर एक दूसरे की पूरक हैं और इन दोनों के सह- अस्तित्व पर ही मानव शरीर और राष्ट्रों का अस्तित्व निर्भर करता है।”२ श्री रजा एकता तथा विभिन्नता को परस्पर विरोधी नहीं मानते बल्कि वह उन्हें एक दूसरे में अभिन्नता का पूरक मानते हैं। जिस प्रकार एक उपवन में विविध रंग के पुष्प एक साथ खिलते है तथा जिनके अनेक नाम होते है जो नामों से विभिन्नता को धारण करते हुए भी गन्ध रूपी एकता में बँधे हुए होते है। जिनका अस्तित्व एक- दूसरे पर निर्भर करता है। अतः इसी प्रकार राष्ट्र-राष्ट्रीय एकता रूपी भावना पर निर्भर रहता है। डा० जे० एस० वेदी के अनुसार- “राष्ट्रीयएकता का अर्थ है देश के विभिन्न राज्यों के व्यक्तियों की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं भाषा-विषयक विभिन्नताओं को वांछनीय सीमा के अन्तर्गत रखना और उनमें भारत की एकता का समावेश करना।”३ उपर्युक्त विचार से स्पष्ट है कि देश के विभिन्न राज्यों की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं भाषा सम्बन्धी विभिन्नता के होते हुए भी समानता की भावना तथा देश के प्रति निजत्व की भावना ही विभिन्नता को एकता के सूत्र में बांधे रहती है, जिससे राष्ट्र का स्वरूप सजीव हो उठता है। डा० राधाकृष्णन् के अनुसार- “राष्ट्रीय एकता एक ऐसी समस्या है जिससे सभ्य राष्ट्र के रूप में हमारे अस्तित्व का घनिष्ठ सम्बन्ध है।”४ १. हाई समाजिक विज्ञान भाग- १, पृ० ३६३ २. हाई समाजिक विज्ञान भाग- १, पृ० ३६३ ३. शिक्षा के सामान्य सिद्धान्त, लेखक- पाठक एवं त्यागी, पृ० १६३ ४. उपर्युक्त, पृ० १६३

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28 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता पर बल देते हुए श्री कृष्णन् ने राष्ट्रीय एकता को एक समस्या कहा है और जिसका समाधान करना अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि राष्ट्र से हमारा घनिष्ठ सम्बन्ध है। राष्ट्र ही हमारा अस्तित्व है। अतः राष्ट्र के अस्तित्व को बनाये रखते हेतु राष्ट्रीय एकता का होना अत्यन्त आवश्यक है। राष्ट्रीय एकता के द्वारा ही हम स्वयं को तथा अपने राष्ट्र को सुरक्षित कर सकते हैं। वाई०वी० चव्हाण भारतीयों को राष्ट्रीय एकता से सम्बद्ध करते हुए कहते हैं कि- "राष्ट्रीय एकता समय का सबसे बड़ा सवाल है और हर कीमत पर उसे बनाये रखना है। प्रत्येक नागरिक को यह सोचना चाहिए कि पहले वह भारतीय है, इसके बाद और कुछ।"१ श्री चव्हाण जी के उपर्युक्त मत से स्पष्ट है कि कोई भी व्यक्ति पहले भारतीय है तत्पश्चात् कुछ और। अतः इस प्रकार धर्म, जाति, सम्प्रदाय, संस्कृति, सभ्यता, प्रान्त आदि की विविधता राष्ट्रीय एकता में बाधक नहीं, अपितु उन्हें राष्ट्रीयता रूपी एकता के सूत्र में बाँधने में साधक ही है। राष्ट्रीय एकता के प्रति भारतीयों का ध्यान आकर्षित करते हुए डा० कानूनगो लिखते हैं कि "राष्ट्रीय एकता की हर देश को हर समय आवश्यकता है। किन्तु भारत के लिए इसकी कहीं अधिक आवश्यकता है।"२ राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता विषय का उद्देश्य :- राष्ट्रीय एकता राष्ट्र का प्राणतत्त्व होती है। जिस प्रकार प्राण के अभाव में शरीर निष्प्रयोजन हो जाता है उसी प्रकार राष्ट्रीय एकता के अभाव में राष्ट्र का अस्तित्व ही नहीं रह जाता। एकता अर्थात् राष्ट्रीय एकता से तात्पर्य है राष्ट्र के व्यक्तियों में, स्थान, भाषा, धर्म, जाति, संस्कृति आदि किसी भी आधार पर भिन्नता होते हुए भी उन्हें एकता के सूत्र में बँधे रहना। राष्ट्रीय एकता की उपमा हम वृक्ष से दे सकते हैं :- राष्ट्रीयएकता एक सम्पूर्ण वृक्ष है जिसकी शाखाएँ भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के मनुष्य हैं, उन शाखाओं के फूल और फल रीतिरिवाज व विचारधारायें हैं और तना है राष्ट्र। वृक्ष से यदि शाखाओं, फल-फूल, पत्ती और तने को पृथक् कर दिया जाये तो उसे हम सम्पूर्ण वृक्ष नहीं कह सकते, इसी प्रकार राष्ट्रीय एकता भी समस्त नागरिकों को राष्ट्र से जुड़ने अर्थात् १. हाई स्कूल सामाजिक विज्ञान भाग-१, पृ० ३६१ २. शिक्षा के सामान्य सिद्धान्त, लेखक- पाठक एवं त्यागी, पृ० १६४।

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 29 राष्ट्र के प्रति आस्था रखने से ही सम्भव हो सकती है। यही राष्ट्रीय एकता राष्ट्रीय अखण्डता की आधार शिला है। जब तक राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता की भावना समस्त नागरिकों के हृदय में विद्यमान नहीं होगी, तब तक राष्ट्रीय अखण्डता की कल्पना करना ही व्यर्थ है। इस प्रकार राष्ट्रीय एकता राष्ट्रीय अखण्डता की पूरक है। राष्ट्र में अमन-चैन बना रहे तथा राष्ट्र की अखण्डता कभी भंग न हो यही राष्ट्रीय एकता का उद्देश्य है। यह उद्देश्य तभी सार्थक हो सकता है जब समस्त धर्मावलम्बी तथा विविध भाषाभाषी धर्म तथा भाषा की विभिन्नता के होते हुए भी एक-दूसरे को स्वयं उसी प्रकार अभिन्न समझें जिस प्रकार एक घर में रहने वाले व्यक्ति भिन्न- भिन्न प्रकार के वस्त्र, आभूषण तथा पृथक्-पृथक् विचारों वाले होते हुए एक ही घर में रहते हैं तथा उसकी अखण्डता को बनाये रखते हैं। उसी प्रकार राष्ट्र में रहने वाले विभिन्न प्रकार के मतावलम्बी, भाषा-भाषी अपने राष्ट्र को अपने परिवार के समान उसकी देखरेख करते हुए स्वयं को राष्ट्र रूपी शरीर का अंग मानते हैं और अपने राष्ट्र के प्रति सदैव समर्पित रहते हैं। वे ही, उसके आदर्श नागरिक कहलाते हैं। यदि राष्ट्र सुरक्षित होता है तो वह स्वयं को सुरक्षित अनुभव करते हैं, यदि राष्ट्र असुरक्षित होता है तो वह तन, मन, धन से समर्पित हो उसकी मन-वचन कर्म से रक्षा करते हुए, अपने प्राणों को न्यौछावर करने में तनिक भी संकोच नहीं करते क्योंकि जब राष्ट्र उन्नति करता है तो वह स्वयं को उन्नत मानते हैं जिससे राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रीय अखण्डता को स्थायित्व प्राप्त होता है। अतः प्रत्येक राष्ट्रवासी का कर्त्तव्य है कि वह राष्ट्रीय एकता एवम् राष्ट्रीय अखण्डता में बाधक तत्त्वों का निवारण करे और उसे नन्हें पौधे के समान सींचकर उसको पुष्पित तथा फलित वृक्ष के समान तैयार कर अपने कर्त्तव्यों का पालन करें, तभी राष्ट्र सदैव अखण्ड, उन्नतिशील, समृद्धिवान, प्रभुत्वसम्पन्न रह सकेगा। राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता के द्वारा ही राष्ट्रीय अखण्डता बनी रहती है क्योंकि जब हम एक रहेगें अर्थात् ऊँच-नीच, भेद-भाव, जाति-धर्म, सम्प्रदाय को विस्मृत कर एकता की डोर में बँध जायेगें। प्रत्येक के प्रति हम मानवता का व्यवहार करेगें अर्थात् आदमी को आदमी समझेगें न कि किसी विशेष धर्म, प्रान्त, सम्प्रदाय आदि से सम्बन्धित मानव। तब राष्ट्र के विभाजन का प्रश्न स्वयं ही समाप्त हो जायेगा। जैसे अधोलिखित पक्तियों से स्पष्ट है- प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से मिलने के लिए किसी धर्म, सम्प्रदाय का सहारा नहीं लेना चाहिए बल्कि संकीर्ण विचारधारा से ऊपर उठकर आदमी को आदमी ही समझना चाहिए। एक सामान्य नागरिक जगदीश कश्यप के अनुसार- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 30 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता रात से तुम मिलो चाँदनी की तरह, और दिन से मिलो रोशनी की तरह। प्रार्थना मेरी तुमसे ये है दोस्तो, आदमी से मिलो आदमी की तरह॥ इस प्रकार राष्ट्र की एकता एवम् अखण्डता का प्रमुख उद्देश्य है राष्ट्र को आन्तरिक तथा बाह्य रूप से सुरक्षा प्रदान करना। यह सुरक्षा तभी प्रदान की जा सकती है जब राष्ट्र के समस्त नागरिक एकता की डोर में बँधे हो। यही बन्धन उनमें राष्ट्रीयता की भावना को बल प्रदान करता है। जिससे लोगों में 'हम' की भावना पनपती है और राष्ट्र सबल होता है तथा किसी भी परिस्थिति में आन्तरिक तथा बाह्य दोनों रूप में किसी भी संकट का सामना सरलता से कर सकता है और यह राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के द्वारा ही सम्भव है क्योंकि राष्ट्र में एकता नहीं होगी तो राष्ट्र टुकड़ों-टुकड़ों में बँट जायेगा और चरमरा कर ढह जायेगा। इस प्रकार राष्ट्र की आन्तरिक तथा बाह्य सुरक्षा राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता पर निर्भर है और राष्ट्र, समस्त नागरिकों की एकता की भावना पर। राष्ट्र के समस्त निवासियों पर राष्ट्र की बाह्य तथा आन्तरिक सुरक्षा हेतु पारस्परिक सहयोग अपेक्षित है और प्रत्येक जन-जन का सहयोग तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब उनमें 'हम' की भावना हो। यही भावना उन्हें राष्ट्र से जोड़ती है और राष्ट्र की आन्तरिक व बाह्य सुरक्षा करने को तैयार करती है। विदेशियों द्वारा आक्रमण किये जाने पर या किसी विशेष परिस्थिति, आतंकवाद, अराजकता, अशांति का सामना करने हेतु एकता आवश्यक तत्त्व है और इस तत्त्व के सहयोग से ही राष्ट्र में एकता स्थापित की जा सकती है तथा राष्ट्र को अखण्ड सदैव रखा जा सकता है। देश में शान्ति का स्थायित्व राष्ट्रीय एकता के द्वारा ही प्रदान किया जा सकता है। अगर धर्म, सम्प्रदाय, जाति, वर्ण-भेद आदि को समाप्त कर, सब एक हो जाएँ और राष्ट्र को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान करें और यह अनुभव करें कि हम सब एक हैं तो सम्भवतः राष्ट्र में सदैव शान्ति बनी रहेगी, जिससे राष्ट्र प्रत्येक क्षेत्र में उन्नति करेगा। विदेशों में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त करेगा तथा राष्ट्रीय स्तर ऊँचा उठेगा। राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के द्वारा ही राजनैतिक वातावरण स्वच्छ रह सकता है क्योंकि जब प्रत्येक राजनेता निःस्वार्थ भाव से राष्ट्रहित के लिए कार्य करेगा तो स्वतः ही राष्ट्र का राजनैतिक वातावरण स्वस्थ होगा, जिससे राष्ट्र की शासन-व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहेगी। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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प्रथम अध्याय 31 इस प्रकार राष्ट्रीय एकता एवम् राष्ट्रीय अखण्डता का उद्देश्य है राष्ट्र की प्रत्येक क्षेत्र में उन्नति करना तथा समस्त देशवासियों को एकता के महत्त्व से परिचित कराना। विषय की मौलिकता और महत्त्व- राष्ट्र का आवश्यक तत्त्व राष्ट्रीय एकता स्वयं में सदैव मौलिक रहा है तथा इसकी महत्ता पुरातन् काल से लेकर आज तक सदैव अनुभव की जाती रही है। जब- जब राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता का अभाव हुआ है लोगों में फूट पड़ी है। तब ही राष्ट्र का पतन हुआ है तथा राष्ट्रीय अखण्डता को ठेस पहुँची है तथा राष्ट्र विभिन्न खण्डों में विभाजित हुआ है। नागरिकों में स्वार्थ की भावना पनपी है। धर्मों, सम्प्रदायों, जातियों तथा प्रान्तों आदि को महत्त्व प्रदान किया गया है। एक धर्म, सम्प्रदाय, जाति तथा प्रान्त विशेष के लोग दूसरे धर्म, सम्प्रदाय, जाति तथा प्रान्त विशेष के लोगों के शत्रु हुए हैं। आपसी वैर-भाव, द्वेष, ईर्ष्या आदि सैकड़ों बीमारियाँ फैली है। मानवता त्रस्त हुई है। मानव ने स्वयं को सर्वथा असुरक्षित अनुभव किया है। जिससे वह विभिन्न विचार-धाराओं, राजनैतिक संगठनों, धर्मों के विभिन्न विवादों के घेरे में बँटा है। जिसके कारण परस्पर उपद्रव, दंगे, आतंक, खून-खराबा तथा धर्म के नाम पर झगड़े आदि को बढ़ावा मिला है, तभी राष्ट्रीय भावना लुप्त हुई है अर्थात् राष्ट्रीय एकता व अखण्डता को ठेस पहुँची है। राष्ट्रीय एकता का मानव के जीवन में अत्यधिक महत्त्व है जिसके अभाव में वह स्वयं को आदर्श नागरिक सिद्ध ही नहीं कर सकता तथा राष्ट्र के प्रति अपने सम्पूर्ण कर्त्तव्यों का निःस्वार्थ भाव से पालन ही नहीं कर सकता। आदर्श नागरिकता हेतु आवश्यक है मनुष्य में राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना का होना। यही समर्पण की भावना मनुष्य को राष्ट्र से जोड़ती है। यह समर्पण की भावना नागरिक में तभी आ सकती है जब सम्पूर्ण राष्ट्र में उसका उठना-बैठना अर्थात् आना जाना हो अर्थात् वह राष्ट्र के समस्त उत्सवों, आयोजनों में भाग लेता हो। जब उसका कार्य-व्यवहार एक साथ होगा तो सम्भवतः आत्मीयता बढ़ेगी। आत्मीयता होने के कारण परस्पर एक दूसरे के विचारों, भावनाओं को समझने का सुअवसर प्राप्त होगा जिससे राष्ट्रीय एकता को बल मिलेगा। अखण्ड राष्ट्र से जुड़कर ही प्रत्येक नागरिक राष्ट्र के महत्त्व से परिचित हो सकता है तथा राष्ट्र को धर्म से भी अधिक महत्त्व प्रदान कर सकता है। अर्थात् "राष्ट्र देवोभव" की भावना से स्वयं को गुम्फित कर सकता है। राष्ट्रीय एकता एवम अखण्डता के प्रति अपनी उद्भावना के बल पर उन सभी

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