वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 47, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 19 वैदिक विद्वानों के अनुसार- धर्म वह है जिससे अभ्युदय व निःश्रेयस की सिद्धि हो। अभ्युदय से लौकिक तथा निःश्रेयस से पारलौकिक उन्नति एवं कल्याण का बोध होता है। उपर्युक्त विचारों से स्पष्ट है कि धर्म के द्वारा ही सम्पूर्ण संसार का अर्थात् राष्ट्र का संरक्षण तथा उन्नति सम्भव है क्योंकि धर्म से ही प्रत्येक जन के हृदय में सेवा भाव जाग्रत होता है। दूसरों की सेवा करना ही मानव धर्म है जैसे कहा भी गया है- “परेषाम् उपकारः परोपकारः।” धर्म से ही व्यक्तियों में बन्धुत्व की भावना जाग्रत होती है, परन्तु आज के युग में धर्म को राष्ट्रीय एकता के निर्माण का प्रमुख आधार तत्त्व मानने में विवाद है। क्योंकि आज अनेक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रों की स्थापना हो गयी है, जिस प्रकार हमारा भारतवर्ष। परन्तु धर्म का राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्र की अखण्डता बनाये रखने में महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि धर्म मानवता का सन्देश देता हुआ व्यक्ति को परमात्मा से जोड़ता है अर्थात् जीव तथा आत्मा के सम्बन्धों का विश्लेषण करता है। इस प्रकार धर्म ही व्यक्ति को बुराइयों से बचाता है और अच्छाइयों को अपनाने की प्रेरणा प्रदान करता है। व्यक्ति के विकास हेतु धर्म के लक्षणों को इस प्रकार लक्षित किया है- धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥१ अर्थात् धैर्य, क्षमा, विषय-भोगों का दमन करना, चोरी न करना, बाहर-भीतर की स्वच्छता, इन्द्रिय-निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध- ये धर्म के दस लक्षण हैं। निस्सन्देह इन गुणों को अपनाने से व्यक्ति के विकास में कोई सन्देह नहीं है। जब व्यक्ति का वैयक्तिक विकास होगा तभी वह अपने ही धर्म की भाँति सभी धर्मों का समादर करेगा। परमात्मा सभी धर्मों का मूल है। जब परमात्मा एक है तो सभी धर्म एक ही है भले ही हम उसे अपनी भाषा सुविधानुसार किसी भी नाम से पुकारे। इस प्रकार धर्म राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रीय अखण्डता को व्यापकता प्रदान करता है तथा राष्ट्र की एकता तथा अखण्डता को महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करता है। ४. राष्ट्रभाषा- राष्ट्रीय एकता के निर्माण में भाषा की एकता भी महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। समान भाषा के परिणाम-स्वरूप ही लोगों में परस्पर अपनत्व की भावना का प्रादुर्भाव होता है। राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डराष्ट्र को स्थिरता प्रदान करने में भाषा, जाति, १. मनुस्मृति CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar