भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 353 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 46

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 18 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता व्यक्ति को राष्ट्र से जोड़ती है और राष्ट्र द्वारा प्रदत्त सामाजिक तथा राजनीतिक भौगोलिक अधिकारों के उपयोग एवं उसके बदले में राष्ट्रों के प्रति कर्त्तव्यों के पालन का विश्वास दिलाती है। इस प्रकार नागरिकता एक ऐसी भावना है जो नागरिक के हृदय में अपनेपन के भाव को जाग्रत करती है जिससे नागरिक अपने आपको राष्ट्र का अंग समझने लगते हैं, राष्ट्र के उत्थान को अपना उत्थान तथा पतन को अपना पतन मानते हैं। उनकी यही भावना राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ तथा अखण्ड राष्ट्र की निर्माणक है। राष्ट्र की उन्नति हेतु ही आदर्श नागरिक अपने हितों का त्याग करने में तनिक भी संकोच नहीं करते। पवित्र धर्मग्रन्थ मनुस्मृति में त्याग की इस भावना का कितना सटीक वर्णन किया गया है जैसे- त्यजेद्देहं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्। ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत॥ १ अर्थात् मनुष्य को अपने कुल के लिए देह का, ग्राम के लिए कुल का, देश के लिए ग्राम का और आत्मारूपी मानवता के लिए पृथ्वी तक का त्याग कर देना चाहिए। त्याग की भावना तथा राष्ट्र की उन्नति ही नागरिकता की आधारशिला है। ३. धर्म- अखण्ड राष्ट्र तथा राष्ट्रीय एकता के निर्माण में वैदिक काल से ही धर्म का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। धर्म अत्यधिक व्यापक शब्द है। व्यक्ति जो कुछ धारण करता है वही उसका धर्म है जैसे 'धारयति इति धर्मः'। जिससे उसे अभ्युदय व निःश्रेयस से पारलौकिक उन्नति का बोध होता है। महाभारत में भीष्म पितामह ने धर्म की व्याख्या इस प्रकार की है कि धर्म शब्द 'धृ' धातु से बना है जिसका अर्थ है धारण करना। अभ्युदय, अपीड़न और धारण अर्थात् संरक्षण जिस उपाय से हो, वही धर्म है। धर्म में ही वह क्षमता है जिससे जगत् का संरक्षण होता है। धर्म के कारण ही व्यक्ति अपने स्थान अथवा पद में बन रहते हैं। जो जगत् की स्थिति का कारण हो और प्राणियों की प्रत्यक्ष उन्नति एवं मोक्ष प्राप्ति का हेतु बने, वही धर्म है।२ श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार- "यज्ञ, दान, तप रूप, कर्म अर्थात् विश्वरूप परमेश्वर की अखण्ड तथा अनन्य भाव से सेवा ही धर्म है।"३ १. मनुस्मृति। २. महाभारत, शान्तिपर्व, अध्याय १०९, श्लोक १०-१२. ३. श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय १८, श्लोक ५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar