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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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22 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के मन में भी नई चेतना और प्राण आ जाते हैं। इस प्रकार सामाजिक वातावरण सुखद और सुन्दर बना रहता है। भर्तृहरि ने तो साहित्य-रहित मनुष्य को पुच्छ-विहीन पशु की उपाधि से विभूषित कर दिया है। यथा- साहित्य संगीत कला विहीनः। साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः ॥ इस प्रकार सत् साहित्य गंगा के समान सबका हित करता है तथा सत्यं शिवं सुन्दरम् की कल्याणमयी भावना से युक्त होता है। आचार्य मम्मट ने भी अपने काव्यप्रकाश में काव्य का लक्षण करते हुए "शिवेतरक्षतये" १ को ही काव्य के अन्य गुणों की अपेक्षा अधिक महत्त्व दिया है। साहित्य सम्पूर्ण राष्ट्र, व्यक्ति, समाज पर अपना विशेष प्रभाव डालता है जिससे राष्ट्रीयएकता को बल मिलता है। साहित्य के माध्यम से ही हम अपनी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति, धर्म तथा आचार-विचार से भलीभांति परिचित होते हैं तथा साहित्य द्वारा निर्दिष्ट आदर्शों पर चलने की प्रेरणा पाकर स्वयं को गौरवान्वित करते हैं। साहित्य ही एक ऐसा आधार तत्त्व है जो किसी भी राष्ट्र में व्याप्त अशान्ति को शान्त कर राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता को स्थायित्व प्रदान कर सकता है। जैसे भारत के वैदिक तथा लौकिक साहित्य की विशाल निधि इसका उत्तम उदाहरण है। जिसमें सर्वत्र राष्ट्रीय एकता एवम् राष्ट्रीय अखण्डता परक भावों की झलक दिखायी पड़ती है। इस प्रकार 'साहित्य' राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता रूपी शरीर का रक्त है। ९. संस्कृति- 'संस्कृति' शब्द का सामान्य अर्थ है संशोधन करना अर्थात् परिष्कार करना। जो संस्कार आत्मा अथवा चित्त का परिष्कार करते हैं वही संस्कृति कहलाते हैं। संस्कृति ही एक ऐसा आधार स्तम्भ है जो राष्ट्र की अखण्डता तथा उसकी अलौकिक निधि राष्ट्रीय एकता को बनाये रखती है। संस्कृति ही मानवमन से अपने-पराये के क्षुद्र विचारों की संकीर्णता रूपी अज्ञान को दूर कर 'वसुधैव कुटुम्बकम्' अर्थात् ज्ञान की ज्योति प्रकाशित कर अमरत्व रूपी शान्ति प्रदान करती है तथा निःश्रेयस कल्याण की भावना का विस्तार करती है। सभी राष्ट्रों की अपनी संस्कृति होती है और अपनी संस्कृति के कारण ही प्रत्येक राष्ट्र की अपनी पहचान होती है। मुख्यतः राष्ट्रों का झुकाव अपनी संस्कृति की ओर विशेषतया रहता है क्योंकि राष्ट्र जितना अपनी संस्कृति को महत्त्व देता है उतना १. आचार्य मम्मट का काव्यप्रकाश

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar