वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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प्रथम अध्याय 31 इस प्रकार राष्ट्रीय एकता एवम् राष्ट्रीय अखण्डता का उद्देश्य है राष्ट्र की प्रत्येक क्षेत्र में उन्नति करना तथा समस्त देशवासियों को एकता के महत्त्व से परिचित कराना। विषय की मौलिकता और महत्त्व- राष्ट्र का आवश्यक तत्त्व राष्ट्रीय एकता स्वयं में सदैव मौलिक रहा है तथा इसकी महत्ता पुरातन् काल से लेकर आज तक सदैव अनुभव की जाती रही है। जब- जब राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता का अभाव हुआ है लोगों में फूट पड़ी है। तब ही राष्ट्र का पतन हुआ है तथा राष्ट्रीय अखण्डता को ठेस पहुँची है तथा राष्ट्र विभिन्न खण्डों में विभाजित हुआ है। नागरिकों में स्वार्थ की भावना पनपी है। धर्मों, सम्प्रदायों, जातियों तथा प्रान्तों आदि को महत्त्व प्रदान किया गया है। एक धर्म, सम्प्रदाय, जाति तथा प्रान्त विशेष के लोग दूसरे धर्म, सम्प्रदाय, जाति तथा प्रान्त विशेष के लोगों के शत्रु हुए हैं। आपसी वैर-भाव, द्वेष, ईर्ष्या आदि सैकड़ों बीमारियाँ फैली है। मानवता त्रस्त हुई है। मानव ने स्वयं को सर्वथा असुरक्षित अनुभव किया है। जिससे वह विभिन्न विचार-धाराओं, राजनैतिक संगठनों, धर्मों के विभिन्न विवादों के घेरे में बँटा है। जिसके कारण परस्पर उपद्रव, दंगे, आतंक, खून-खराबा तथा धर्म के नाम पर झगड़े आदि को बढ़ावा मिला है, तभी राष्ट्रीय भावना लुप्त हुई है अर्थात् राष्ट्रीय एकता व अखण्डता को ठेस पहुँची है। राष्ट्रीय एकता का मानव के जीवन में अत्यधिक महत्त्व है जिसके अभाव में वह स्वयं को आदर्श नागरिक सिद्ध ही नहीं कर सकता तथा राष्ट्र के प्रति अपने सम्पूर्ण कर्त्तव्यों का निःस्वार्थ भाव से पालन ही नहीं कर सकता। आदर्श नागरिकता हेतु आवश्यक है मनुष्य में राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना का होना। यही समर्पण की भावना मनुष्य को राष्ट्र से जोड़ती है। यह समर्पण की भावना नागरिक में तभी आ सकती है जब सम्पूर्ण राष्ट्र में उसका उठना-बैठना अर्थात् आना जाना हो अर्थात् वह राष्ट्र के समस्त उत्सवों, आयोजनों में भाग लेता हो। जब उसका कार्य-व्यवहार एक साथ होगा तो सम्भवतः आत्मीयता बढ़ेगी। आत्मीयता होने के कारण परस्पर एक दूसरे के विचारों, भावनाओं को समझने का सुअवसर प्राप्त होगा जिससे राष्ट्रीय एकता को बल मिलेगा। अखण्ड राष्ट्र से जुड़कर ही प्रत्येक नागरिक राष्ट्र के महत्त्व से परिचित हो सकता है तथा राष्ट्र को धर्म से भी अधिक महत्त्व प्रदान कर सकता है। अर्थात् "राष्ट्र देवोभव" की भावना से स्वयं को गुम्फित कर सकता है। राष्ट्रीय एकता एवम अखण्डता के प्रति अपनी उद्भावना के बल पर उन सभी
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