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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 41

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 13 एक संगठित समूह है, उन व्यक्तियों का जो अपनी पारस्परिक समानता के प्रति सजग होते हैं।१ गार्नर महोदय की परिभाषा इस ओर संकेत करती है कि राष्ट्र उन व्यक्तियों का समूह कहलाता है जिनमें पारस्परिक समानता होती है, जिसके प्रति वे सदैव सजग रहते हैं। साम्यवादी विचारक स्तालिन के अनुसार– राष्ट्र ऐतिहासिक प्रक्रिया से निर्मित वह स्थायी जनसमुदाय है जिसका निर्माण समान भाषा, भूमि, आर्थिक जीवन और समान संस्कृति के रूप में अभिव्यक्त एक से मानसिक गठन के आधार पर हुआ हो।२ उपर्युक्त विचार से स्पष्ट है कि राष्ट्र अपने मूल निर्माणक तत्त्वों जैसे समान भाषा, भूमि, आर्थिक स्तर, संस्कृति पर मूलतः निर्भर होता है जिनका आधार है समस्त जनसमुदाय का समान मानसिक संगठन तथा देश के प्रति सच्ची भक्ति। प्रादियर फोदरे के अनुसार– जिन-जिन तत्त्वों के सयुंक्त रूप से 'राष्ट्र' शब्द का बोध होता है, वे हैं– प्रजाति, भाषा, रीति-रिवाज तथा धर्म।'३ फ्रांस के लेखक प्रादियर फोदरे ने राष्ट्र को इन चारों– प्रजाति, भाषा, रीतिरिवाज तथा धर्म के संयुक्त को 'राष्ट्र' शब्द से अभिहित किया है। यहाँ पर इन्होंने इन चारों के व्यापक रूप को प्रस्तुत किया जैसे प्रजाति से तात्पर्य उनका समस्त मानव जाति से है न कि किसी जाति विशेष से। इसी प्रकार भाषा से तात्पर्य उनका राष्ट्रभाषा से है। रीति-रिवाज से संस्कृति विशेष से है जो राष्ट्र के गौरव की कथा कहती है, जो प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्र से जोड़ती है। इसी प्रकार धर्म से तात्पर्य यहाँ मानव धर्म से है न कि हिन्दू या मुस्लिम धर्म विशेष से। हॉलैड रोज के अनुसार– राजनीतिक दृष्टि से संगठित जनता को ही राष्ट्र कहते हैं। रोज के अनुसार राजनैतिक दृष्टि से जब राष्ट्र के समस्त तत्त्व होते हैं और राजनैतिक दृष्टि से शासन व्यवस्था सुचारु रूप से चलती रहती है वही सुसंगठित जनता अर्थात् समाज ही राष्ट्र कहलाने लगता है। नेविको के अनुसार– राष्ट्र एक सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक एकता है और वह सामाजिक विकास का सर्वोत्कृष्ट उत्पादन होता है।४ १. आर०सी० अग्रवाल की राष्ट्रीय आन्दोलन एवं संवैधानिक विकास, पृ० ३ २. सत्यनारायण दुबे की आधुनिक राजनीतिक विचारधाराएँ, पृ० ३३१ ३. डा० आर०पी० साहनी की राजनीति शास्त्र के सिद्धान्त, पृ० १५९ ४. डा० इकबाल नारायण की राजनीति शास्त्र के मूल सिद्धान्त, पृ० ८० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar