वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 14 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता ब्लुंशली के मतानुसार- राष्ट्र ऐसे व्यक्तियों का समूह होता है जो विशेषतः भाषा और प्रथाओं द्वारा परस्पर एक-सी सभ्यता में आबद्ध होता है और जिसके कारण उसमें एकता तथा सब विदेशियों से पृथकता का भाव उत्पन्न हो जाता है।१ ब्लुंशली जी ऐसे व्यक्तियों के समूह को राष्ट्र कहते है जिनकी विशेष रूप से भाषा, प्रथा, सभ्यता एक हो तथा वह सब एकता के सूत्र मे गुँथे होने के साथ- साथ विदेशियों से पृथक् उनकी अपनी अलग पहचान हो। उपर्युक्त विचारों से स्पष्ट है कि सभी ने अपने-अपने मतानुसार राष्ट्र के स्वरूप को परिभाषित करने का प्रयास किया और एकता, समानता जिसके आवश्यक अंग हैं। राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के आधार तत्त्व “वसुधैव कुटुम्बकम्" भारतीय संस्कृति का एक आदर्श है। इस आदर्श की संकल्पना वैदिक है। हमारे धर्मग्रन्थों में इसको उल्लिखित किया गया है। हमारे वैदिक ऋषियों ने समग्र मानवता को एक माना है, सबके कल्याण की कामना की है। यथा :— सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥२ ऋग्वेद के निम्न मंत्र में भी मानव मात्र की समता की झलक स्पष्ट दिखाई पड़ती है। अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते संभ्रातरो वावृधुः सौभगाय। युवा पिता स्वसा रुद्र एषां सुदुघा पृशिनः सुदिना मरूद्द्भ्यः॥३ वेदों में वर्णित समता, सहृदयता और स्नेह का यह आदर्श अधिकांशतः मानव जाति के सन्दर्भ में प्रतिष्ठित हुआ है। यही भावना आगे चलकर उपनिषदों और गीता में विस्तारित हुई है। परम एकत्व के आदर्श के अन्तर्गत समस्त प्राणियों और वनस्पतियों तक के प्रति भी समभाव प्रकट किया गया है। १. उपर्युक्त, पृ० ८० २. संस्कृत परिचायिका, पृ० ५९ (मुख्यतः 'पद्मपुराण' से) ३. ऋग्वेद ५/६०/५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar