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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 55

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प्रथम अध्याय 27 “अनेकता में एकता इस प्रकार बैठी है जैसे शरीर में भिन्न-भिन्न अवयवों के होते हुए भी रीढ़ की हड्डी में चलता हुआ स्नायु मंडल।”१ श्री जैन ने राष्ट्र को मानव शरीर की उपमा देते हुए कहा है- राष्ट्र एक मानव शरीर है। उसमें विभिन्न विचारधाराओं और मतों को मानने वाले विभिन्न धर्मों के लोग भिन्न-भिन्न अवयवों की भाँति होते हैं। भिन्न अवयवों को रीड़ की हड्डी एक शरीर के रूप में स्थापित रखती हैं, परन्तु इस आधार स्तम्भ रीड़ की हड्डी में बहुत ही सूक्ष्म स्नायु मंडल अनेकता के रूप में विद्यमान रहते हैं। यही अनेकता में एकता का मूल सार है। राष्ट्रीय शैक्षणिक नियोजन एवं प्रशासन संस्थान, नई दिल्ली के निदेशक प्रो० यूनिस रजा के अनुसार “विकास का मनोविज्ञान हमें सिखाता है कि एकता और विभिन्नता की प्रक्रिया परस्पर विरोधी न होकर एक दूसरे की पूरक हैं और इन दोनों के सह- अस्तित्व पर ही मानव शरीर और राष्ट्रों का अस्तित्व निर्भर करता है।”२ श्री रजा एकता तथा विभिन्नता को परस्पर विरोधी नहीं मानते बल्कि वह उन्हें एक दूसरे में अभिन्नता का पूरक मानते हैं। जिस प्रकार एक उपवन में विविध रंग के पुष्प एक साथ खिलते है तथा जिनके अनेक नाम होते है जो नामों से विभिन्नता को धारण करते हुए भी गन्ध रूपी एकता में बँधे हुए होते है। जिनका अस्तित्व एक- दूसरे पर निर्भर करता है। अतः इसी प्रकार राष्ट्र-राष्ट्रीय एकता रूपी भावना पर निर्भर रहता है। डा० जे० एस० वेदी के अनुसार- “राष्ट्रीयएकता का अर्थ है देश के विभिन्न राज्यों के व्यक्तियों की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं भाषा-विषयक विभिन्नताओं को वांछनीय सीमा के अन्तर्गत रखना और उनमें भारत की एकता का समावेश करना।”३ उपर्युक्त विचार से स्पष्ट है कि देश के विभिन्न राज्यों की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं भाषा सम्बन्धी विभिन्नता के होते हुए भी समानता की भावना तथा देश के प्रति निजत्व की भावना ही विभिन्नता को एकता के सूत्र में बांधे रहती है, जिससे राष्ट्र का स्वरूप सजीव हो उठता है। डा० राधाकृष्णन् के अनुसार- “राष्ट्रीय एकता एक ऐसी समस्या है जिससे सभ्य राष्ट्र के रूप में हमारे अस्तित्व का घनिष्ठ सम्बन्ध है।”४ १. हाई समाजिक विज्ञान भाग- १, पृ० ३६३ २. हाई समाजिक विज्ञान भाग- १, पृ० ३६३ ३. शिक्षा के सामान्य सिद्धान्त, लेखक- पाठक एवं त्यागी, पृ० १६३ ४. उपर्युक्त, पृ० १६३

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar