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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 29 राष्ट्र के प्रति आस्था रखने से ही सम्भव हो सकती है। यही राष्ट्रीय एकता राष्ट्रीय अखण्डता की आधार शिला है। जब तक राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता की भावना समस्त नागरिकों के हृदय में विद्यमान नहीं होगी, तब तक राष्ट्रीय अखण्डता की कल्पना करना ही व्यर्थ है। इस प्रकार राष्ट्रीय एकता राष्ट्रीय अखण्डता की पूरक है। राष्ट्र में अमन-चैन बना रहे तथा राष्ट्र की अखण्डता कभी भंग न हो यही राष्ट्रीय एकता का उद्देश्य है। यह उद्देश्य तभी सार्थक हो सकता है जब समस्त धर्मावलम्बी तथा विविध भाषाभाषी धर्म तथा भाषा की विभिन्नता के होते हुए भी एक-दूसरे को स्वयं उसी प्रकार अभिन्न समझें जिस प्रकार एक घर में रहने वाले व्यक्ति भिन्न- भिन्न प्रकार के वस्त्र, आभूषण तथा पृथक्-पृथक् विचारों वाले होते हुए एक ही घर में रहते हैं तथा उसकी अखण्डता को बनाये रखते हैं। उसी प्रकार राष्ट्र में रहने वाले विभिन्न प्रकार के मतावलम्बी, भाषा-भाषी अपने राष्ट्र को अपने परिवार के समान उसकी देखरेख करते हुए स्वयं को राष्ट्र रूपी शरीर का अंग मानते हैं और अपने राष्ट्र के प्रति सदैव समर्पित रहते हैं। वे ही, उसके आदर्श नागरिक कहलाते हैं। यदि राष्ट्र सुरक्षित होता है तो वह स्वयं को सुरक्षित अनुभव करते हैं, यदि राष्ट्र असुरक्षित होता है तो वह तन, मन, धन से समर्पित हो उसकी मन-वचन कर्म से रक्षा करते हुए, अपने प्राणों को न्यौछावर करने में तनिक भी संकोच नहीं करते क्योंकि जब राष्ट्र उन्नति करता है तो वह स्वयं को उन्नत मानते हैं जिससे राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रीय अखण्डता को स्थायित्व प्राप्त होता है। अतः प्रत्येक राष्ट्रवासी का कर्त्तव्य है कि वह राष्ट्रीय एकता एवम् राष्ट्रीय अखण्डता में बाधक तत्त्वों का निवारण करे और उसे नन्हें पौधे के समान सींचकर उसको पुष्पित तथा फलित वृक्ष के समान तैयार कर अपने कर्त्तव्यों का पालन करें, तभी राष्ट्र सदैव अखण्ड, उन्नतिशील, समृद्धिवान, प्रभुत्वसम्पन्न रह सकेगा। राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता के द्वारा ही राष्ट्रीय अखण्डता बनी रहती है क्योंकि जब हम एक रहेगें अर्थात् ऊँच-नीच, भेद-भाव, जाति-धर्म, सम्प्रदाय को विस्मृत कर एकता की डोर में बँध जायेगें। प्रत्येक के प्रति हम मानवता का व्यवहार करेगें अर्थात् आदमी को आदमी समझेगें न कि किसी विशेष धर्म, प्रान्त, सम्प्रदाय आदि से सम्बन्धित मानव। तब राष्ट्र के विभाजन का प्रश्न स्वयं ही समाप्त हो जायेगा। जैसे अधोलिखित पक्तियों से स्पष्ट है- प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से मिलने के लिए किसी धर्म, सम्प्रदाय का सहारा नहीं लेना चाहिए बल्कि संकीर्ण विचारधारा से ऊपर उठकर आदमी को आदमी ही समझना चाहिए। एक सामान्य नागरिक जगदीश कश्यप के अनुसार- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar