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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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प्रथम अध्याय 25 समस्त देशवासी जाति, धर्म, सम्प्रदाय, प्रान्त आदि को विस्मृत कर सभी मेलों तथा उत्सवों में एक साथ मिल-जुल कर भाग लें तथा एक दूसरे के कल्याण की कामना करें। राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के प्रचार-प्रसार तथा अनुभव योग्य बनाने के लिए शिक्षा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण साधन है जिसकी आज भी प्रत्येक राष्ट्र को आवश्यकता है। शिक्षा के अभाव में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्ड राष्ट्र की कल्पना करना भी निरर्थक है। इसके सम्बन्ध में डा० राधा कृष्णन कहते हैं कि "राष्ट्रीय एकता ईंट और हथोड़े से नहीं बनती। यह लोगों के दिल और दिमाग में चुपके-चुपके विकसित होती है। इसका एकमात्र ढंग शिक्षा का ढंग है।"१ उपर्युक्त विचार से स्पष्ट है कि शिक्षा के माध्यम से ही प्रत्येक व्यक्ति को यह ज्ञान कराया जा सकता है कि राष्ट्र से बड़ा कोई धर्म नहीं है। लोकमान्य बालगंगाधर ने भी राष्ट्र को धर्म से भी ऊँचा स्थान दिया है और राष्ट्र का ईश्वर के साथ एकात्म्य स्थापित किया है। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के अनुसार- "ईश्वर तथा हमारा देश एक-दूसरे से भिन्न नहीं है। संक्षेप में हमारा देश ईश्वर का ही एक रूप है।"२ अतः राष्ट्रीय एकता की भावना को जाग्रत करने हेतु आवश्यक है प्रत्येक जन को स्वदेश के प्रति प्रेम, भक्ति तथा 'हम' की भावना से परिचित कराना तथा उसका महत्त्व समझाना। राष्ट्र की उन्नति में सहायक तत्त्वों से अवगत कराना तथा स्वराष्ट्र का संस्कृति सम्बन्धी ज्ञान प्रदान करना। "राष्ट्र ही सर्वोपरि है।" अतः हमारा अपना अस्तित्व ही हमारा राष्ट्र है और हम राष्ट्र के संरक्षक है। इस प्रकार 'हम' की भावना अर्थात् समानता, एकता की भावना को पुष्पित तथा पल्लवित करने के लिए तथा राष्ट्र की अखण्डता के लिए आवश्यक है राष्ट्र के समस्त प्रान्तों से तथा राष्ट्र में निवास करने वाली समस्त जातियों, सम्प्रदायों से अधिक से अधिक मेल उत्पन्न करना तथा बन्धुत्व की भावना को बढ़ाना तथा राष्ट्रीय भक्ति तथा राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत साहित्य का पठन-पाठन कराना तथा विविध पद्धतियों द्वारा उनको प्रस्तुत करना तथा व्यवहार के योग्य बनाना। स्कूल तथा कॉलेज के पाठ्यक्रम में राष्ट्रीयपरक साहित्य को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान करना। इस प्रकार राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता का प्रयोजन है राष्ट्र को सर्वोपरि महत्त्व

१. कैडेट पत्रिका Vol. 41, 1991 २. सत्यनारायण दुबे की आधुनिक राजनीतिक शास्त्र CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar