भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 353 में से

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पृष्ठ 68

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 40 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता कहते हैं— तेभ्यः मन्त्रेभ्यः हि अध्यात्म अधिदेव अधियज्ञादि मन्तारो मन्यते, तदेषां मन्त्रत्वम्। मनन हेतुर्मन्त्रः। मन्त्र मनन का हेतु है, इन्हीं मन्त्रों से मनन के उपरान्त मननशील विद्वानों, कवियों, ऋषियों तथा विचारकों ने अध्यात्म, अधिदैव तथा अधियज्ञादि को यथार्थ ग्रहण किया। इसी कारण यास्क का कथन है— सत्काम ऋषिः यस्यां आर्थपत्यमिच्छन्। स्तुतिं प्रयुङ्क्ते तद्दैवतः स मन्त्रो भवति॥ (निरुक्त (७/७/१/१) निरुक्त का सातवां अध्याय दैवत काण्ड के नाम से प्रसिद्ध है। वेद में अमुक सूक्त अथवा मन्त्र का अमुक देवता है, इस विषय का ज्ञान मनन के बिना सम्भव नहीं। मन्त्र का देवता अथवा मन्त्रार्थ मनन के द्वारा ही स्पष्ट होता है। ऋषियों तथा वेदज्ञों ने आर्थपत्य, पद, पदार्थ पद में छिपी शक्ति, कर्म आदि की अभिलाषा की, तो जिस देवता में उन्हें स्तुति प्रयुक्त जान पड़ी, उसी देवता वाला वह मन्त्र हो गया। इस प्रकार एक ही मन्त्र के तीन प्रकार के अर्थ हो सकते हैं— अध्यात्मपरक, अधिदेवपरक तथा अधियज्ञपरक। इस अर्थ में मन्त्र का मनन ही हेतु होता है। इसके बिना अर्थ ज्ञान सम्भव ही नहीं। यास्क ने निरुक्त में लिखा है— कर्म सम्पत्तिः मन्त्रो वेदे (निरुक्त १, २) अर्थात् मन्त्र वेद में उस कर्म सम्पत्ति के मार्ग को प्रशस्त करते हैं जो हमें आनन्दधाम तक ले जा सकता है। यास्कानुसार जिस इच्छा से ऋषि मन्त्रोच्चारण करता है तथा जिस देवता से वह अपने अर्थ का सम्पादन कराने की अभिलाषा रखता है, वह मन्त्र उसी देवता से सम्बद्ध हो जाता है। अतः तीन प्रकार की इच्छा होने के कारण तीन प्रकार की ऋचाएँ भी होती हैं— (१) परोक्षकृत, (२) प्रत्यक्षकृत एवं (३) आध्यात्मिक। परोक्षकृत ऋचाएँ गुह्य (छिपी हुई) हैं। प्रत्यक्षकृत ऋचाएँ विषय से सीधे सम्बन्धित होते हैं। आध्यात्मिक ऋचाएँ आत्मसम्बन्धी तथा उपासनापरक होती हैं। इन तीन प्रकार की ऋचाओं के अतिरिक्त दो प्रकार की ऋचाएँ और भी होती हैं, उनकी संज्ञा है, प्राजापत्य तथा नराशंस। प्राजापत्य ऋचाओं में जड़ एवं चेतन तत्त्वों का संमिश्रण होता है तथा नाराशंस ऋचाएँ माता, पिता, गुरु, अतिथि आदि से सम्बन्धित होती हैं। सामान्यतया यज्ञों में वेद मन्त्रों का ही विनियोग होता था। सर्वानुक्रमणी वृत्ति की भूमिका में लिखा है— “विनियोक्तव्य रूपो यः स मन्त्र इति चक्षते। विधिस्तुतीकरं शेषं ब्राह्मणाः कथयन्ति हि॥” CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar